इंतख़ाबात के मौसम में...
आज, ग्यारह सितंबर को यहाँ देश भर में लोकसभा निचले सदन के संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है....
इस बार चुनाव का मौक़ा अचानक ही आया, जो तत्कालीन प्रधान मंत्री कोइज़ुमि जुन्'इचिरो (小泉 純一郎; वैसे जापानी में नाम पहले पारिवारिक, उसके बाद अपना नाम आता है, जैसे दक्षिण भारतीयों की तरह) के ख़ुद अकेले ही फ़ैसले सेसभा सदन भाँग कर दिए जाने की वजह से हुआ है.
(इस चुनाव की परिस्थितियों के बारे में और जानकारी बी.बी.सी. के न्यूज़-पेज पे मिलेगें. )
आगे तो मेरे, यानी एक वोट के हक़दार के, विचार है...
इन हफ़्तों से कुछ कहा जाता है कि आजकल जापान की राजनीति में द्वि-महा-पार्टियों के आमने-सामने का समय आ रहा है, जैसे अमरीका और ब्रिटेन में सदियों से होता रहा है.
वैसे इन सालों से बार बार पार्टियों के विभाजन व गठबंधन होकर स्थिति ऐसी ही रूप में आ गई तो है. मगर यह खुले आम अच्छी मानने वाली बात है?
द्वि-महा-पार्टियों की एक तरफ़ एलडीपी (自民党;जिमिन-तो, नाम तो उतारतावादी जैसा, लेकिन रूढ़िवादी), आधी सदी से ज़्यादा सालों से (लगभग) लगातार शासन में रह रही है. दूसरी तरफ़, डीपीजे (民主党;मिंशु-तो) गठित होकर एक दशक भी नहीं हुआ है, और अब तक सत्ता में कभी नहीं आया है. तो कैसे इस स्थिति को अमरीका-ब्रिटेन की द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की तरह मानी जा सकती है, जहाँ दोनों पार्टी बराबर सत्ता में आती बदलती रह चुकी हैं.
इस लिए उस नज़र से यहाँ की राजनैतिक स्थिति को अमरीकी-ब्रिटेन की से एक ही तरह देखना उचित नहीं होगा.
फिर... द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि कभी वोट करने में फ़र्क़ नहीं पड़ती या वोटिंग से पहले ऐसा लग जाता है, जब दोनों पार्टियों से भी पूरी सहमत न हो पाए. मेरा मतलब यह नहीं है कि सब पार्टी की महाकांक्षाओं में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं (मगर यह भी कभी तो हो सकता है). वह ऐसी दिक़्क़त है कि आगर किसी मुद्दे को लेकर एक पार्टी से सहमत हूँ, दूसरे मुद्दों को लेकर तो असहमत...
क्या करूँ यार, शायद मेरी तरह लाखों मतदाता जोकि आम तौर पॉलिटिक्स-वॉलिटिक्स के बारे में विस्तार से साचे तो नहीं रहते हैं. लेकिन वोट तो करना ही पड़ेगा इसी बार तो ज़रूर. कई मुद्दों को लेकर इस देश का भविष्य जिस राह पर चलेगा, उसको चुनना है. वैसे जो नतीजा निकलेगा उससे हालत सुधरेगा या बिगड़ेगा, यह भी तो न पता (जो भी जीतेंगे, वह नतीजा तो ज़रूर नहीं होगा जिससे सबके लिए फ़ायदा हो) .
बीस की उम्र से अधिकार हासिल कर जिन कई बार वोट किया है, हर समय ऐसा महसूस कभी नहीं हुआ कि कुछ तो अपने वोट से बदलेगा. फिर भी इस बार तो बहुत उम्मीदें हैं कि कुछ बदलेगा या बदलने को है.
आख़िर, इस चुनाव में दो रास्ते हैं कि कोइज़ुमि जी हटेंगे या बढ़ेंगे. मेरी नज़र से वे अच्छे तो हैं मगर अब प्रधानमंत्री के पद से उन्हें हटने चाहिए भी.
उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि उन्होंने इराक़ में सेना भेजी है बग़ैर काफ़ी बहस व अवाम की सहमति. हाँ, सियासत की दुनिया में केवल विचार से पॉलिसी नहीं चलती, ताक़तवर शख़्सियत की ज़रूरत है. कभी तो ऐसे बड़े फ़ैसले करने के लिए ज़बरदस्ती भी करनी पड़ेगी, जिनको लेकर आम लोगों की राय विशेषज्ञों से अलग हो, अगर नहीं तो सियासत पॉप्युलिज़्म में बह जाएगी. मगर यह तरीक़ा भी एक-दो बार का ही है, आगे कोई न सहना न अनदेखी करना पाएँगे.
उन्होंने "देश के लिए, अवाम के लिए" वाले बहाने से अमीर की तरह बिना अवाम से कुछ बताए बहुत अहम मुद्दे तय कर चुके हैं, फिर इस समय जब उनकी महत्वपूरणतम डाक-निजीकरण बिल राज्यपरिषद में अटक गई तो अचानक भंग घोषित कर कहा दिया कि जनता से पूछेंगे हमारे साथ इस देश का पुनर्निर्माण अंत तक पूरा कर लेंगे या नहीं...
अभी उनके कहने से मेरा कोई भरोसा नहीं... जीतेंगे तो फिर न कुछ सुनेंगे अवाम की, न पूछेंगे जनता से.

फिर भी अब तक ऐसे दूसरे शख़्स नज़र में नहीं आए हैं जिनके पास कोइज़ुमि की तरह देश चलवाने को काफ़ी हासियत हो. यह भी दूसरी दिक़्क़त तो होगी यहाँ की सियासत की...
इस बार चुनाव का मौक़ा अचानक ही आया, जो तत्कालीन प्रधान मंत्री कोइज़ुमि जुन्'इचिरो (小泉 純一郎; वैसे जापानी में नाम पहले पारिवारिक, उसके बाद अपना नाम आता है, जैसे दक्षिण भारतीयों की तरह) के ख़ुद अकेले ही फ़ैसले से
(इस चुनाव की परिस्थितियों के बारे में और जानकारी बी.बी.सी. के न्यूज़-पेज पे मिलेगें. )
आगे तो मेरे, यानी एक वोट के हक़दार के, विचार है...
इन हफ़्तों से कुछ कहा जाता है कि आजकल जापान की राजनीति में द्वि-महा-पार्टियों के आमने-सामने का समय आ रहा है, जैसे अमरीका और ब्रिटेन में सदियों से होता रहा है.
वैसे इन सालों से बार बार पार्टियों के विभाजन व गठबंधन होकर स्थिति ऐसी ही रूप में आ गई तो है. मगर यह खुले आम अच्छी मानने वाली बात है?
द्वि-महा-पार्टियों की एक तरफ़ एलडीपी (自民党;जिमिन-तो, नाम तो उतारतावादी जैसा, लेकिन रूढ़िवादी), आधी सदी से ज़्यादा सालों से (लगभग) लगातार शासन में रह रही है. दूसरी तरफ़, डीपीजे (民主党;मिंशु-तो) गठित होकर एक दशक भी नहीं हुआ है, और अब तक सत्ता में कभी नहीं आया है. तो कैसे इस स्थिति को अमरीका-ब्रिटेन की द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की तरह मानी जा सकती है, जहाँ दोनों पार्टी बराबर सत्ता में आती बदलती रह चुकी हैं.
इस लिए उस नज़र से यहाँ की राजनैतिक स्थिति को अमरीकी-ब्रिटेन की से एक ही तरह देखना उचित नहीं होगा.
फिर... द्वि-महा-पार्टियिक राजनीति की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि कभी वोट करने में फ़र्क़ नहीं पड़ती या वोटिंग से पहले ऐसा लग जाता है, जब दोनों पार्टियों से भी पूरी सहमत न हो पाए. मेरा मतलब यह नहीं है कि सब पार्टी की महाकांक्षाओं में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं (मगर यह भी कभी तो हो सकता है). वह ऐसी दिक़्क़त है कि आगर किसी मुद्दे को लेकर एक पार्टी से सहमत हूँ, दूसरे मुद्दों को लेकर तो असहमत...
क्या करूँ यार, शायद मेरी तरह लाखों मतदाता जोकि आम तौर पॉलिटिक्स-वॉलिटिक्स के बारे में विस्तार से साचे तो नहीं रहते हैं. लेकिन वोट तो करना ही पड़ेगा इसी बार तो ज़रूर. कई मुद्दों को लेकर इस देश का भविष्य जिस राह पर चलेगा, उसको चुनना है. वैसे जो नतीजा निकलेगा उससे हालत सुधरेगा या बिगड़ेगा, यह भी तो न पता (जो भी जीतेंगे, वह नतीजा तो ज़रूर नहीं होगा जिससे सबके लिए फ़ायदा हो) .
बीस की उम्र से अधिकार हासिल कर जिन कई बार वोट किया है, हर समय ऐसा महसूस कभी नहीं हुआ कि कुछ तो अपने वोट से बदलेगा. फिर भी इस बार तो बहुत उम्मीदें हैं कि कुछ बदलेगा या बदलने को है.
आख़िर, इस चुनाव में दो रास्ते हैं कि कोइज़ुमि जी हटेंगे या बढ़ेंगे. मेरी नज़र से वे अच्छे तो हैं मगर अब प्रधानमंत्री के पद से उन्हें हटने चाहिए भी.
उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि उन्होंने इराक़ में सेना भेजी है बग़ैर काफ़ी बहस व अवाम की सहमति. हाँ, सियासत की दुनिया में केवल विचार से पॉलिसी नहीं चलती, ताक़तवर शख़्सियत की ज़रूरत है. कभी तो ऐसे बड़े फ़ैसले करने के लिए ज़बरदस्ती भी करनी पड़ेगी, जिनको लेकर आम लोगों की राय विशेषज्ञों से अलग हो, अगर नहीं तो सियासत पॉप्युलिज़्म में बह जाएगी. मगर यह तरीक़ा भी एक-दो बार का ही है, आगे कोई न सहना न अनदेखी करना पाएँगे.
उन्होंने "देश के लिए, अवाम के लिए" वाले बहाने से अमीर की तरह बिना अवाम से कुछ बताए बहुत अहम मुद्दे तय कर चुके हैं, फिर इस समय जब उनकी महत्वपूरणतम डाक-निजीकरण बिल राज्यपरिषद में अटक गई तो अचानक भंग घोषित कर कहा दिया कि जनता से पूछेंगे हमारे साथ इस देश का पुनर्निर्माण अंत तक पूरा कर लेंगे या नहीं...
अभी उनके कहने से मेरा कोई भरोसा नहीं... जीतेंगे तो फिर न कुछ सुनेंगे अवाम की, न पूछेंगे जनता से.

फिर भी अब तक ऐसे दूसरे शख़्स नज़र में नहीं आए हैं जिनके पास कोइज़ुमि की तरह देश चलवाने को काफ़ी हासियत हो. यह भी दूसरी दिक़्क़त तो होगी यहाँ की सियासत की...


( 3 Comments:
good information.
मत्सु, बहुत रोचक और सूचनाप्रद लेख है। क्या जापानी संसद को "लोकसभा" कहना सही होगा? "संसद" एक जातिवाचक संज्ञा है पर "लोकसभा" व्यक्तिवाचक -- भारत की संसद के निचले सदन का नाम।
>इंद्र जी
Thanks!
>रमण जी
पहले सोचा था कि मिसाल के तौर पर काउंटर्पार्ट शब्द से लिखूँ तो समझाना आसान होगा. मगर बाद में बीबीसी हिंदी देखके मेरी ग़लती समझा. फिर आपके सुझाव से पूरा यक़ीन आया. अब ठीक कर दिए हैं.
आप की मदद के लिए बहुत थैंक्स!
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