ಶನಿವಾರ ೮ ಆಗಸ್ಟ್ ೨೦೦೯
चुनाव है !!
जापान में आजकल गरमागरम हवा चलने लगती है, मगर मौसम की नहीं राजनीति की. वर्तमान प्रधानमंत्री तारो आसो ने पिछले महीने संसद का निचला सदन सत्र के बीच में ही भंग करने का फ़ैसला किया, और अब अगली सत्ता की कुर्सी को लेकर आम चुनाव होने वाला है. वोट की मतदान और गिनती देश भर में इस महीने के आख़िर रविवार 30 अगस्त को होगी.
कहा जाता है कि विश्व आर्थिक संकट के बाद सामने आए कई बड़े मसाइल, जैसे बेरोज़गारी, ग़रीबी और आजीविका सुरक्षा वग़ैरह, और कुछ लंबे अर्से से बहस में आते रहे पेंशन प्रणाली, समाज कल्याण आदि अन्य कई मुद्दों पर मतदाताओं की ध्यान केंद्रित हो रही है. इन दो हफ़्तों में प्रमुख राजनैतिक पार्टियों ने चुनाव के लिए अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता व्यक्त की है.
मगर मुझे लगता है कि वे सब कहीं न कहीं मिलती जुड़ती हैं या एक सी बातें बस अलग अलग मुँहों से हो रही हैं.
और मतदाताओं का दिल जीतने के लिए कहीं ऐसे वायदा का सौदा भी किया जा रहा दिखता है, जिनके मुताबिक चाहे बमुश्किल बिल पास हो जाए तो भी फिर उस क़ानून को वास्तविक तौर पर अमल में लाना और इसे लगातार लागू करना वित्तीय साधन की नज़रिए से बहुत कम संभावना हो. मसलन, देश में कम होती जन्म दर और बच्चों की संख्या को और घटने से रोकने का ऐसा उपाय घोषणा किया गया, वह है "बाल पालन भत्ता" (डेमोक्रेटिक पा॰), यानी कि बच्चे को पालते माँ-बाप को बच्चे के अनिवार्य शिक्षा पूरा करने (लगभग पंद्रह साल होने) तक प्रति बच्चा सालाना 3 लाख 12 हज़ार येन (लगभग डेर लाख रुपये; 1 रु॰ = 2.1 येन) का भत्ता सरकार की तरफ़ से प्रदान किया जाएगा. शिक्षा का ख़र्चा भोज हलका करने के लिए और इससे सामाजिक असमानता कम करने के लिर सरकारी माध्यमिक शिक्षा का व्यावहारिक नि:शुल्ककरण और उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति का विस्तारकरण वग़ैरह भी. संक्षेप में कहें तो किसी न किसी तरह सरकारी अनुदान के बढ़ाव की बातें ज़्यादा नज़र आती हैं.
ऐसे मीठे वायदे के अलावा, ज़्यादातर पार्टियाँ और नेता बार-बार दावा करते हैं "आप आम नागरिकों के हित में" या "अवाम की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्राथमिकता देकर" राजनीति करने को. अब मेरे ख़्याल में यह सवाल उठता है कि ऐसे दावे में पुकारे जाते हम "आम नागरिक" या "अवाम", आख़िर कौन-से और कहाँ होते हैं, और हमारा कैसा हित होता है. लेकिन यह ज़ाहिर है कि हम और हमरा हित अब हरगिज़ एकल नहीं रहेगा. क्योंकि जहाँ वित्त के स्रोत कमतर हो रहा है और ऐसे सीमित बजट को हर तरफ़ काफ़ी बाँटना नामुमकिन-सा है, वहाँ आम नागरिकों के बीच आय स्तर, व्यावसाय, आवासीय क्षेत्र, आयुवर्ग, पुरुष-महिला, विवाहित-अविवाहित और किसी दूसरी आर्थिक-सामाजिक स्थिति के आयामों पर अपने अपने अलग हितों को लेकर कहीं न कहीं संघर्ष खड़े हो सकते हैं.
इस तथ्य को धुंधलाकर, यानी सबसे ज़्यादा किस समूह के लोगों की प्रतिनिधि कर रही हैं यह साफ़ न बताकर बहुमत हासिर करने का कई प्रमुख पार्टियों का इरादा समझा जा सकता है. मेरा मानना है कि "आम नागरिकों" के नाम पर चुनाव लड़ने वाले नेताओं से ज़्यादा भरोसा न करूँ तो बहतर होगा क्योंकि इस क़िस्म का नारा बस चुनाव के लिए ही रहेगा.
इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि छ: दशकों से ज़्यादा अर्से लगभग निरंतर सत्तारूढ़ पार्टी की स्थान पर रही एलडीपी की हार ज़्यादा सँभव बताई जा रही है और यह इस लिए है कि इन 2 सालों में 2 प्रधानमंत्रियों ने एक के बाद एक अपनी पद से इस्तीफ़ा दे दिया है और कई मंत्रियों के कदाचार, विलंबित या नाकाम रहा कई मुद्दों का हल और पार्टी की नेतृत्वहीनता वग़ैरह को देखकर, अब सार्वजनिक तौर पर पार्टी की लोकप्रियता घटी हुई कही जाती है और आसो साहब के ख़िलाफ़ सिर्फ़ पार्टी के बाहर से नहीं बल्कि अपनी पार्टी के अंदर से भी विरोध की आवाज़ उठ रही हैं.
ऐसे संकट में फँसे एलडीपी के सामने खड़ी आई है सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी डीपी, जो उच्च सदन में तो बहुमत हासिर कर चुकी है. हाँ, यह तो सच है कि इन कई सालों से एलडीपी के बजाय दूसरी विकल्प के रूप में डीपी मतदाताओं का रुख़ खींच पा रही है, अपनी लोकप्रियता काफ़ी बढ़ाते आई है, और "शासन में परिवर्तन" लाने की बात हमेशा करती है.
मगर इस पार्टी के ज़्यादा नेताओं ने पहले एलडीपी से ही बाहर निकलकर यही विपक्षी दल बनाया, और एलडीपी की नेतृत्वहीनता की आलोचना अक्सर करने के बावजूद अपना ही पार्टी प्रमुख भी अक्सर बदलता आया है और पार्टी के अंदर कभी कभी टकलाव भी होता कहा जाता है.
और यह भी लगता है कि डीपी की "शासन में परिवर्तन" वाली बात, जिससे पार्टी ने निस्संदेह अपनी ऐसी छवि बनाई कि उसके बाद देश में आशा की किरण आएगी और सब कुछ ठीक हो जएगा, कुछ ज़्यादा ही बताई जा रही है. सत्तांतरण तो अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता को निभाने का बस एक साधन या प्रक्रिया ही है, न कि अंतिम लक्ष्य.
इस पार्टी की ऐसी हालत को देखकर लगता है कि चाहे इस चुनाव के बाद "शासन में परिवर्तन" हो जाए, फिर भी देश की राजनीति में किसी न किसी निराशाजनक घटना होती रहेगी ही.
इस तरह अभी ग़ौर किया जा रहा है कि किसको वोट दूँ और इस वोट से मेरा क्या कुछ होगा...

कहा जाता है कि विश्व आर्थिक संकट के बाद सामने आए कई बड़े मसाइल, जैसे बेरोज़गारी, ग़रीबी और आजीविका सुरक्षा वग़ैरह, और कुछ लंबे अर्से से बहस में आते रहे पेंशन प्रणाली, समाज कल्याण आदि अन्य कई मुद्दों पर मतदाताओं की ध्यान केंद्रित हो रही है. इन दो हफ़्तों में प्रमुख राजनैतिक पार्टियों ने चुनाव के लिए अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता व्यक्त की है.
मगर मुझे लगता है कि वे सब कहीं न कहीं मिलती जुड़ती हैं या एक सी बातें बस अलग अलग मुँहों से हो रही हैं.
और मतदाताओं का दिल जीतने के लिए कहीं ऐसे वायदा का सौदा भी किया जा रहा दिखता है, जिनके मुताबिक चाहे बमुश्किल बिल पास हो जाए तो भी फिर उस क़ानून को वास्तविक तौर पर अमल में लाना और इसे लगातार लागू करना वित्तीय साधन की नज़रिए से बहुत कम संभावना हो. मसलन, देश में कम होती जन्म दर और बच्चों की संख्या को और घटने से रोकने का ऐसा उपाय घोषणा किया गया, वह है "बाल पालन भत्ता" (डेमोक्रेटिक पा॰), यानी कि बच्चे को पालते माँ-बाप को बच्चे के अनिवार्य शिक्षा पूरा करने (लगभग पंद्रह साल होने) तक प्रति बच्चा सालाना 3 लाख 12 हज़ार येन (लगभग डेर लाख रुपये; 1 रु॰ = 2.1 येन) का भत्ता सरकार की तरफ़ से प्रदान किया जाएगा. शिक्षा का ख़र्चा भोज हलका करने के लिए और इससे सामाजिक असमानता कम करने के लिर सरकारी माध्यमिक शिक्षा का व्यावहारिक नि:शुल्ककरण और उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति का विस्तारकरण वग़ैरह भी. संक्षेप में कहें तो किसी न किसी तरह सरकारी अनुदान के बढ़ाव की बातें ज़्यादा नज़र आती हैं.
ऐसे मीठे वायदे के अलावा, ज़्यादातर पार्टियाँ और नेता बार-बार दावा करते हैं "आप आम नागरिकों के हित में" या "अवाम की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्राथमिकता देकर" राजनीति करने को. अब मेरे ख़्याल में यह सवाल उठता है कि ऐसे दावे में पुकारे जाते हम "आम नागरिक" या "अवाम", आख़िर कौन-से और कहाँ होते हैं, और हमारा कैसा हित होता है. लेकिन यह ज़ाहिर है कि हम और हमरा हित अब हरगिज़ एकल नहीं रहेगा. क्योंकि जहाँ वित्त के स्रोत कमतर हो रहा है और ऐसे सीमित बजट को हर तरफ़ काफ़ी बाँटना नामुमकिन-सा है, वहाँ आम नागरिकों के बीच आय स्तर, व्यावसाय, आवासीय क्षेत्र, आयुवर्ग, पुरुष-महिला, विवाहित-अविवाहित और किसी दूसरी आर्थिक-सामाजिक स्थिति के आयामों पर अपने अपने अलग हितों को लेकर कहीं न कहीं संघर्ष खड़े हो सकते हैं.
इस तथ्य को धुंधलाकर, यानी सबसे ज़्यादा किस समूह के लोगों की प्रतिनिधि कर रही हैं यह साफ़ न बताकर बहुमत हासिर करने का कई प्रमुख पार्टियों का इरादा समझा जा सकता है. मेरा मानना है कि "आम नागरिकों" के नाम पर चुनाव लड़ने वाले नेताओं से ज़्यादा भरोसा न करूँ तो बहतर होगा क्योंकि इस क़िस्म का नारा बस चुनाव के लिए ही रहेगा.
इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि छ: दशकों से ज़्यादा अर्से लगभग निरंतर सत्तारूढ़ पार्टी की स्थान पर रही एलडीपी की हार ज़्यादा सँभव बताई जा रही है और यह इस लिए है कि इन 2 सालों में 2 प्रधानमंत्रियों ने एक के बाद एक अपनी पद से इस्तीफ़ा दे दिया है और कई मंत्रियों के कदाचार, विलंबित या नाकाम रहा कई मुद्दों का हल और पार्टी की नेतृत्वहीनता वग़ैरह को देखकर, अब सार्वजनिक तौर पर पार्टी की लोकप्रियता घटी हुई कही जाती है और आसो साहब के ख़िलाफ़ सिर्फ़ पार्टी के बाहर से नहीं बल्कि अपनी पार्टी के अंदर से भी विरोध की आवाज़ उठ रही हैं.
ऐसे संकट में फँसे एलडीपी के सामने खड़ी आई है सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी डीपी, जो उच्च सदन में तो बहुमत हासिर कर चुकी है. हाँ, यह तो सच है कि इन कई सालों से एलडीपी के बजाय दूसरी विकल्प के रूप में डीपी मतदाताओं का रुख़ खींच पा रही है, अपनी लोकप्रियता काफ़ी बढ़ाते आई है, और "शासन में परिवर्तन" लाने की बात हमेशा करती है.
मगर इस पार्टी के ज़्यादा नेताओं ने पहले एलडीपी से ही बाहर निकलकर यही विपक्षी दल बनाया, और एलडीपी की नेतृत्वहीनता की आलोचना अक्सर करने के बावजूद अपना ही पार्टी प्रमुख भी अक्सर बदलता आया है और पार्टी के अंदर कभी कभी टकलाव भी होता कहा जाता है.
और यह भी लगता है कि डीपी की "शासन में परिवर्तन" वाली बात, जिससे पार्टी ने निस्संदेह अपनी ऐसी छवि बनाई कि उसके बाद देश में आशा की किरण आएगी और सब कुछ ठीक हो जएगा, कुछ ज़्यादा ही बताई जा रही है. सत्तांतरण तो अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता को निभाने का बस एक साधन या प्रक्रिया ही है, न कि अंतिम लक्ष्य.
इस पार्टी की ऐसी हालत को देखकर लगता है कि चाहे इस चुनाव के बाद "शासन में परिवर्तन" हो जाए, फिर भी देश की राजनीति में किसी न किसी निराशाजनक घटना होती रहेगी ही.
इस तरह अभी ग़ौर किया जा रहा है कि किसको वोट दूँ और इस वोट से मेरा क्या कुछ होगा...

"ट्रेन में ज़मीन पर बैठना मना है."
ಗುರುವಾರ ೮ ಜನವರೀ ೨೦೦೯
आकेमाशीते बधाई 2009
आप सबको "आकेमाशीते ओमेदेतो गोज़ाइमास", मेरी हार्दिक शुभ्कामनाएँ, चाहे आप नए पॉस्ट का बेसब्र इंतज़ार करते हों, या जभी यहाँ आया करते हों कि आर एस एस फ़ीड मिलती है, या फिर सर्च एंजिन पे कुछ खोजते खोजते यों ही पहुँच गए हों. देखते रहें, इस साल भी शायद कभी-कभार लेकिन ज़रूर लिखता रहूँगा, जापान के एक कोने से...
वैसे तो, चीनी कैलेंडर के अनुसार यह साल "बैल-गाय" का होता है, इस लिए मेरा न्यू यियर कार्ड भी नंदी की एक लोक चित्र पर बनाया है.
वैसे तो, चीनी कैलेंडर के अनुसार यह साल "बैल-गाय" का होता है, इस लिए मेरा न्यू यियर कार्ड भी नंदी की एक लोक चित्र पर बनाया है.ಇದಕ್ಕೆ ಚಂದಾದಾರರಾಗಿ ಪೋಸ್ಟ್ಗಳು [Atom]
