ಗುರುವಾರ ೨ ನವೆಂಬರ್ ೨೦೦೬
बोले तो "नमस्ते इंडिया"...
लगभग डेढ़ महीने पहले की बात है, जब यहाँ तोक्यो में ऐसा दो दिवसीय उत्सव हो रहा था.
उस दिन वहाँ खुले बाज़ार की तरह चादरों के नीचे बहुत-सी दुकानें इकट्ठे लगाई गई थीं, और उनके बीच-बीच के रास्ते तो इनसानों की भीड़ से घने हुए थे. खान-पान, पहनावे-ज़ेवरात और बॉलीवुड, ये सब चीज़ें यतायात लोगों को लुभाकर अपना ग्राहक बना लेती थीं. दूसरी तरफ़ एक कोने में तरह तरह के संगीत-नृत्य का प्रदर्शन भी हो रहा था, और मंच के सामने जमे हुए लोग ख़ूब मज़ा लेते थे.
हम भी घूम रहे थे जलेबी और समोसे का मज़ा लेते हुए, तो दूर से देखा कि भीड़ में एक इंडियन न्यूज़ चैनल वाला माइक लेकर अपने क्रू के साथ खड़ा हुआ था और कैमरा के सामने कुछ रिपोर्टिंग चल रहा था.
तभी तो एक नज़र डालके ही हम आगे चले गए, और उसकी कोई ख़ास याद नहीं रही थी. फिर आज पता चला कि उस रिपोर्टिंग का नतीजा यहाँ देख सकते हैं. शायद आपको ज़रा अहसास दिलाएगा उस दिन के मौज़-मस्ती भरे माहौल का...
उस दिन वहाँ खुले बाज़ार की तरह चादरों के नीचे बहुत-सी दुकानें इकट्ठे लगाई गई थीं, और उनके बीच-बीच के रास्ते तो इनसानों की भीड़ से घने हुए थे. खान-पान, पहनावे-ज़ेवरात और बॉलीवुड, ये सब चीज़ें यतायात लोगों को लुभाकर अपना ग्राहक बना लेती थीं. दूसरी तरफ़ एक कोने में तरह तरह के संगीत-नृत्य का प्रदर्शन भी हो रहा था, और मंच के सामने जमे हुए लोग ख़ूब मज़ा लेते थे.
हम भी घूम रहे थे जलेबी और समोसे का मज़ा लेते हुए, तो दूर से देखा कि भीड़ में एक इंडियन न्यूज़ चैनल वाला माइक लेकर अपने क्रू के साथ खड़ा हुआ था और कैमरा के सामने कुछ रिपोर्टिंग चल रहा था.
तभी तो एक नज़र डालके ही हम आगे चले गए, और उसकी कोई ख़ास याद नहीं रही थी. फिर आज पता चला कि उस रिपोर्टिंग का नतीजा यहाँ देख सकते हैं. शायद आपको ज़रा अहसास दिलाएगा उस दिन के मौज़-मस्ती भरे माहौल का...
ಕಮೆಂಟ್ಗಳು:
<< ಹೋಂ
मत्सु जी,
मैंने आज पहली बार हिन्दी के ब्लॉग इंटरनेट पर देखे और आपका ब्लॉग पाया. मन को इतने भाए की सारे चिट्ठे पढ़ डाले. मुझे अच्छी तरह याद है की मैं भी इस नमस्ते इंडिया मेले में अपने कुछ मित्रों के साथ गया था और इसके अगले साल 2007 में जो मेला हुआ था वहां भी गया था. योयोगी पार्क अच्छा पार्क है.
किंतु हैरानी है की इतने दिनों से आपने चिट्ठे लिखना बंद क्यों कर दिया? उम्मीद है की आप का स्वास्थ्य अच्छा हो.
कुछ और भी प्रश्न हैं मेरे मन में, आज्ञा हो तौ पूछूँ
मैंने आज पहली बार हिन्दी के ब्लॉग इंटरनेट पर देखे और आपका ब्लॉग पाया. मन को इतने भाए की सारे चिट्ठे पढ़ डाले. मुझे अच्छी तरह याद है की मैं भी इस नमस्ते इंडिया मेले में अपने कुछ मित्रों के साथ गया था और इसके अगले साल 2007 में जो मेला हुआ था वहां भी गया था. योयोगी पार्क अच्छा पार्क है.
किंतु हैरानी है की इतने दिनों से आपने चिट्ठे लिखना बंद क्यों कर दिया? उम्मीद है की आप का स्वास्थ्य अच्छा हो.
कुछ और भी प्रश्न हैं मेरे मन में, आज्ञा हो तौ पूछूँ
कूल ब्लॉगर जी,
आपका कॉमेंट देखकर बहुत ख़ुश हुआ.
आजकल जापानी में दूसरा चिट्ठा लिखता हूँ. इसलिए लम्बे अरसे से अपडेट नहीं हो रहा है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने इस चिट्ठे को हमेशा के लिए छोड़ दिया. जब भी मन चाहे, मेरा अगला पॉस्ट डाला जाएगा. (पता नहीं वह तो कब...)
आपका कॉमेंट देखकर बहुत ख़ुश हुआ.
आजकल जापानी में दूसरा चिट्ठा लिखता हूँ. इसलिए लम्बे अरसे से अपडेट नहीं हो रहा है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने इस चिट्ठे को हमेशा के लिए छोड़ दिया. जब भी मन चाहे, मेरा अगला पॉस्ट डाला जाएगा. (पता नहीं वह तो कब...)
पिछली कामेंट का जवाब देने के लिए धन्यवाद....
वैसे एक बात जानना चाहूँगा की आपका नाम हिन्दी में सब लोग जो मत्सु लिखतें हैं, क्या वो मात्सु नहीं होने चाहिए? क्योंकि मैं जितना जापानी भाषा को समझ पाया हूँ, जापानी में 'म' नहीं बल्कि 'मा' ही होता है.
कई बार जापानी में मेरा नाम समझाने में थोडी कठिनाई होती है...क्योंकि जापानी मेरा नाम ディパク की तरह ही उच्चारण करतें हैं.
वैसे एक बात जानना चाहूँगा की आपका नाम हिन्दी में सब लोग जो मत्सु लिखतें हैं, क्या वो मात्सु नहीं होने चाहिए? क्योंकि मैं जितना जापानी भाषा को समझ पाया हूँ, जापानी में 'म' नहीं बल्कि 'मा' ही होता है.
कई बार जापानी में मेरा नाम समझाने में थोडी कठिनाई होती है...क्योंकि जापानी मेरा नाम ディパク की तरह ही उच्चारण करतें हैं.
आप की राय बिल्कुल सही है कि जिस तरह जापानी लोग उच्चारण करते हैं (और जिस तरह हिंदी भाषियों की कानों में सुनाई देते हैं) उसी तरह मेरा नाम "मात्सु" लिखना बेहतर होगा. लेकिन शायद ऐसा भी सोच सकते हैं कि अगर आप मेरा नाम "मत्सु" और "मात्सु" पुकारें तो भी दोनों की फ़र्क़ मुझसे नहीं पहचानी जाएगी, तो "मत्सु" लिखना भी ग़लत तो नहीं होगा.
और..., माफ़ करें, कठिनाई? की बात पूरी समझ नहीं पाई. क्या आपका यह मतलब था कि आपका नाम ディパク नहीं, ディーパク की तरह ही उच्चारण किया जाना चाहिए? अगर रही बात स्वर की लंबाई की हो, तो जब आप अपना परिचय देते हैं उस समय पहले स्वर को थोड़ा लंबा खींचकर "दीईपक" की तरह बोलें, तो कैसा होगा.
और..., माफ़ करें, कठिनाई? की बात पूरी समझ नहीं पाई. क्या आपका यह मतलब था कि आपका नाम ディパク नहीं, ディーパク की तरह ही उच्चारण किया जाना चाहिए? अगर रही बात स्वर की लंबाई की हो, तो जब आप अपना परिचय देते हैं उस समय पहले स्वर को थोड़ा लंबा खींचकर "दीईपक" की तरह बोलें, तो कैसा होगा.
माफ़ी चाहूँगा, इतने दिनों तक उत्तर नहीं दे सका.
मेरे नाम में कठिनाई वाली बात से मेरा मतलब था की लोग दीपक के स्थान पर दीपाक की तरह समझ पाते हैं..किंतु आपका यह व्याख्यान देखकर मुझे अच्छी तरह समझ आ गया....की अ और आ में अन्तर करना न केवल मेरे नाम में बल्कि जापानी लोगों के लिए अपने नाम में भी करना कठिन है....
आपके इस जवाब से मुझे कुछ चीज़ों को समझने में बहुत सहायता मिली...धन्यवाद्
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मेरे नाम में कठिनाई वाली बात से मेरा मतलब था की लोग दीपक के स्थान पर दीपाक की तरह समझ पाते हैं..किंतु आपका यह व्याख्यान देखकर मुझे अच्छी तरह समझ आ गया....की अ और आ में अन्तर करना न केवल मेरे नाम में बल्कि जापानी लोगों के लिए अपने नाम में भी करना कठिन है....
आपके इस जवाब से मुझे कुछ चीज़ों को समझने में बहुत सहायता मिली...धन्यवाद्
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