अप्रैल 12, 2010

भित्तिचित्र "आसू-नो शिंवा"

यह विशाल भित्तिचित्र देखके आया.

आंतरिक तोक्यो के एक मुख्य क्षेत्र "शिबुया" में, "केईओ" (एक निजी रेलवे कंपनी) की "ईनोकाशीरा" लाइन और "जेआर" (यानी जापान रेलवे कंपनी, पूर्व-सरकारी कंपनी जो १९८७ से निजीकृत हुई है) लाइन के दोनों स्टेशनों को जोड़ने वाले संपर्क पथ के दीवार पर है यह भित्तिचित्र, और इसकी चौड़ाई ३० मी और ऊँचाई ५.५ मी है.


यह भित्तिचित्र मशहूर जापानी कलाकार "तारो ओकामोतो" द्वारा रचाया गया था, जो २० वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बहुत सक्रिय रहा और जिसका स्वर्गवास १९८६ में हुआ. यह कलाकार अपने अमूर्त शैली के चित्रों से (या कभी इस भित्तिचित्र जैसे बड़े बड़े स्मारकों से भी) पहचाना जाता है, और जापान में काफ़ी व्यापक रूप से प्रसिद्ध रहा है, ख़ासकर जिसका कुछ "विलक्षण" चरित्र की छवि के लिए (मिसाल के तौर पर, उसका एक मशहूर वचन है "कला होती है धमाका!").

यह भित्तिचित्र मूलतः १९६९ में जब बनाया गया था, तब इसको मेक्सिको के एक होटल में स्थापित होना था. लेकिन उसी होटल का निर्माण कुछ वित्तीय समस्या के कारण आधे रास्ते पर ही रद्द किया गया, और इस अव्यवस्था में यह भित्तिचित्र कहीं खो गया. लगभग तीन दशकों के बाद, जभी तक कलाकार तो न रहा, भित्तिचित्र २००३ में फिर मेक्सिको में ढूँढ निकाला गया तो एक गोदाम के अंदर त्यागा हुआ पया गया और टूट के टुकड़े-टुकड़े तक हो गया था.

उसके बाद इस भित्तिचित्र की मरम्मत के लिए कई संस्थानों द्वारा विशेष परियोजना शरू की गई, जिसकी रहनुमाई काम के लिए तोशिको ओकामोतो, जो रचयिता का निजी सचिव और वास्तविक में उसकी जीवन-साथी भी रही थी, ने जद्दोजहद की.
फिर भित्तिचित्र के बहाल होने के बाद इसके स्थापना स्थल को लेकर कई शहर उम्मीदवार के रूप में सामने आए, लेकिन अंततः शिबुया स्टेशन में २००८ से उसी तरह स्थापित किया गया है, जैसे आज वहाँ गुज़रने वाले, कम्यूटर हो या पर्यटक, सबके सामने सार्वजनिक और निरंतर प्रदर्शन हो रहा है.


यहाँ शीर्षक लिखा है "आसू-नो शिंवा (明日の神話)", जिसका मतलब बनता है "आने वाले कल का मिथक".


अब इस भित्तिचित्र पर ऐसा कहा जाता है कि १९५४ में जापानी मछलीमार नौका "दाई-गो हूकू-रियू-मारू" (यानी, शुभ-अजगर पंचम) पर हुई एक विकिरण दुर्घटना के आधार पर बनाया गया.

हादसा इस तरह हुआ कि; जब वह नौका जापान से सुदूर प्रशांत महासागर के मार्शल द्वीपसमूह तक पहुँचकर टूना मछली पकड़ने के लिए अपने काम में जुती रही थी, उसी वक़्त इस द्वीपसमूह के बिकनी एटोल में अमेरिका द्वारा परमाणु परीक्षण किया गया. चाहे वह नौका और उसपर काम कर रहे २३ मछुआरे हों, या तो फिर वहाँ पकड़ी गई मछलियां हों, इनमें से कोइ भी इस परीक्षण के असर से बच न पाए, और इसके मारे वे सरासर विकिरण-दूषित हो गए.
इस दुर्घटना के परिणाम में, जापान में परमाणु हथियार के प्रति विरोधी आवाज़ काफ़ी बुलंद हो उठी (वैसे, एक रोचक बात यह है कि इस जनादोलन का उदय तोक्यो के एक उपनगरी आवासीय क्षेत्र में गृहणी महिलाओं के बीच हुआ था, और फिर वहाँ से देश भर फैला).

कलाकार ने इस भित्तिचित्र पर ऐसा क्षण का चित्रण किया, जब उसी हादसे में उदजन-बम अभी-अभी फट गया हो, और जहाँ परमाणु की सत्यानाशी आग कुछ भयावह काली हवा की दरारों में भड़कते-धड़कते अपने हाथ बढ़ा रही हो.


लेकिन, भित्तिचित्र का यही इतिहास कोई जाने न जाने, अब इसके सामने बहुत-से लोग व्यस्तता के साथ बस गुज़र जाते हैं.

6 टिप्‍पणियां:

mausi ने कहा…

> अब इसके सामने बहुत-से लोग व्यस्तता के साथ बस गुज़र जाते हैं.

जी, और अमेरिका में ऐसी चीज़ भी बेच रहा है।

http://www.roadsideamerica.com/story/14624

Raviratlami ने कहा…

बढ़िया वर्णन है.

namaste ने कहा…

> मौसी खानुम,
हाय हाय, क्या इयररिंग बना दिए हैं...

> रवि साब,
थैंक्स है जी.

बेचैन आत्मा ने कहा…

सुंदर ब्लॉग ..सुंदर भित्तिचित्र.
दुखद पहलू यह होता है कि कलाकार सम्मान लोग उसके गुजर जाने के बाद ही ठीक से कर पाते हैं. जब तक वह जीवित होता है ..उसके महत्व को उतना नहीं आंकते जितना कि आंकना चाहिए.
रवि जी आभार कि उन्होंने दो अच्छे ब्लॉग के बारे में जानकारी दी.

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

रोचक और अच्छी जानकारी।
हिन्दी में ब्लॉग लेखन के लिए नमन।

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

दोझोओरीशिकु ओनेगाई शिमासु

शायद यह लिखे हुये वाक्य सही हो, मैंने अपने जापान प्रवास पर उसके बाद कई जापानी सहकर्मियों के साथ वार्तालाप करने के उद्देश्य से सीखें थे सन १९९०~१९९७ के दौरान।

आज मुझे जापान में बिताया हुआ समय / हर एक पल याद आ गया, टोक्यो रेल्वे स्टेशन से अकीहाबारा, शिंजुकू, चीबा, निशीचीबा आदि तक जाना और पैदल घूमना, गिंजा और उसके आस-पास असाही शिंबून के दफ्तर तक।

बहुत ही अच्छा ब्लॉग है और बहुत ही खूबसूरत वर्णन, दिल से बधाईयाँ।


सादर,


मुकेश कुमार तिवारी