आज पहली वर्षगाँठ आ रही है. दोपहर दो बजकर छियालीस मिनट पर जब उस भयावह भूकंप ने अचानक आकार लाखों लोंगों की रोज़मर्रे ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी, उस मौके पर देश के हर कोने पर मौन प्रार्थना की जाएगी.
ऊपर ऐसा लिखते हुए भी मैं यकीन नहीं कर पा रहा हूँ कि उस दिन से पहेले और बाद में क्या क्या फ़र्क पड़े हैं अपनी जिंदगी पर, और किस किस तरह असर होते जा रहे हैं इस एक साल के दौरान से लेकर आगे लगातार. यहाँ तोक्यो में भी बड़े झटके तो हुए ही, पर मैं और परिवार समेत मेरे करीब के परिचित लोग किसी मायने में भी इस हादसे से मुतासिर नहीं हुए हैं. न घर खोया न दोस्त-रिश्तेदार, नौकरी या जायदाद. हल्की सी चोट भी नहीं लगी.
हाँ, भूकंप के तुरंत बाद से कई हफ़्तों तक यहाँ की साधारण दैनिक जनजीवन कहीं ठप गई थी, जैसे परमाणु संयत्र दुर्घटना के परिणामस्वरूप बिजली संकट और विकिरण प्रसारण के भय से काफ़ी अफ़रा-तफ़री मची. शहर में हर जगह दुकानों के शेल्फों से कुछ खाद्य उत्पाद गायब हो गए और पेट्रोलियम पंपों पर लंबी लाइन लगी. मीडिया पर हर रोज़ आती थीं त्सुनामी तबाही की भयानक छवियाँ और प्रभावित क्षेत्रों के परिवारों की दर्दनाक कहानियाँ. अखबार पर छपने वाले मृतकों और लापता लोगों के सामयिक आंकड़े प्रतिदिन बढ़ते ही जाते रहे. फिर भी, तब मार्च महीने का मौसम तो ठंडी हवाओं के बीच कहीं ताप और नरमाहट पहुँचाने लग रहा था और पेड़ों की शाखाओं पर कलियाँ साफ़ नज़र आने लगी थीं. बस मामूली तौर पर ही, पर कुछ अजीबो-गरीब छाप में, मोहल्ले में धीमे से वसंत की दस्तक सुनाई दे रही थी. ऐसे हर तरह के ढेर सारे दैनिक अनुभवों की श्रृंखला में उस भूकंप का जीवंत अर्थ ढाला गया हुआ है मेरे लिए (या शायद इस अवधि देश में रहे बहुत से अन्य "अप्रभावित" लोगों के लिए भी).
एक तरफ़ अंदर व्यक्तिगत रूप से और दूसरी तरफ़ बाहर सामाजिक ढंग से सोच कुछ बदली तो ज़रूर होगी, लेकिन यह मुझ से ठीक वर्णन नहीं किया जाता कि बदलाव कहाँ कैसे कितना हुआ है और किस दिशा में जाएगा.
हाल ही में तो सिर्फ़ इस बात की कृपा ही मान पा रहा हूँ कि इसी बदलाव ने निजी दृष्टि से तो ऐसी शोकपूर्ण घटना के बावजूद सौभाग्य से कोइ दुखद मोड़ नहीं लिया, वरना शायद ही अब मैं ऐसा कुछ लिख पाता.
आज के पुलिस एजेंसी आंकड़ों के मुताबिक, इस प्राकृतिक आपदा में मृतकों की संख्या १५,८५४ तक पहुँची हुई है और अभी भी ३,१५५ लोग लापता हुए हैं. ये आंकड़े किसी दूसरे देशों की आपदा, युद्ध, अकाल जैसी घटनाओं की तुलना कितना अपेक्षाकृत कम हैं या ज़्यादा. मुझे यह मालूम नहीं है और मैं इसपर कोइ मायना नहीं रखता. यकीनन इससे भी ज़्यादा बड़े पैमाने पर इंसान की मौत अब दुनिया के कुछ हिस्सों में होती रही होगी ही, मैं अपने निकटतर अपने देश में हुई इन घटनाओं पर ध्यान दे जाता हूँ. हालांकि मेरा मानना है कि इंसान जबतक अपने क़रीब के तजुर्बों के बुनियाद पर तसव्वुर कर न सके तबतक दूसरों की दुख दर्द ठीक से समझ नहीं सकता.
और इस मृतकों के आंकड़े में ऐसे मामले शामिल नहीं हैं जहाँ मौत का सीधा कारण भूकंप या त्सुनामी से तो नहीं है, जैसे तबाही के बाद शरणस्थल पर सेहत बिगड़ जाने के बावजूद इलाज के अभाव और दवाओं की कमी की वजह से या गहरी निराशा और तनहाई में आत्माहत्या करके मर गए हों.
इस सिलसिले में मैं एक ९३ वर्षीया महिला के सुसाइड नोट की ख़बर कभी नहीं भूल पाऊँगा, जिसके अंत में महिला ने ऐसा लिखा कि "हर दिन परमाणु संयंत्र की बातें ही सुनते अब जीने का एहसास भी नहीं होता. ऐसा करने (खुदकुशी) के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है. अलविदा. मैं क़ब्र में ही पनाह ले लूँगी. माफ़ करना." (जापानी में यहाँ; अंग्रेजी में तो मूल पन्ना समय सीमा समाप्त होने से समाचार एजेंसी के जालस्थल से हटाया गया. पर उसकी प्रतिलिपि जाल पर बहुत देखने को मिल जाएगी, जैसे यहाँ).
मैंने यह ख़बर पढ़ी जब कुछ काम के अवसर पर चंद महीनों के लिए देश के बाहर ही रहा था. तब मैं देश की हालत पर बिलकुल फ़रामोशी में तो नहीं था, पर कहीं सारी घटनाओं के प्रभाव से दूर रहकर अपने कामकाज में व्यस्त रहा था. यह ख़बर पढ़कर लगा कि वास्तविकता की कड़वाहट में फिर से खींचा जाता रहा हूँ, और उतना काफ़ी उदास भी लगा कि इस रिपोर्ट पर दूसरों से बात करने से भी कुछ कतराता जाऊँ. पता नहीं, एक किसान बुढ़िया जिन्होंने गाँव में कहीं शांतिपूर्वक जीवन गुज़ारा था और जिन्हें ऐसे ही देहांत तक बिताना था, क्यों उन्हें अंतिम काल में ऐसा देखना पड़ा. कभी कभी मानो ऐसा सोचने को मज़बूर किया जाता हूँ पर मैं जितने भी सोचूँ इस सवाल पर निरुत्तर ही रह जाता हूँ. हाल ही देश में घर से दूर रहने वाले शरणार्थियों की संख्या लगभग सारे ३ लाख बताई जा रही है.
अब यहाँ की तरह पुनर्निर्माण कार्य की गति को लेकर चाहे कितना भी सराहा तो जाता रहे, न जाने इन तस्वीरों को देखकर ऐसा धारणा भी आता है कि जहाँ दृष्टि में बहुत से जो कुछ खो गए दुबारा बन जाते हैं, वहीं तरह तरह के अनदेखे वजूदों का एसास बेहद गहन हो जाता है जो उस नज़ारे से हमेशा के किए खो चुके और दुबारा वापस नहीं होते.
बिना किसी इरादे पे चलता रहेगा ग़ैर-इंडियन के हाथों से. देखते जाइएगा किसी न किसी जगह से जहाँ भी हों. मैं हूँ ना यहीं ,जापान !!!
मार्च 11, 2012
फ़रवरी 29, 2012
दिन बर्फ़बारी का
आज दिन बर्फ़बारी के मारे तोक्यो नगर इलाक़े में यतायात काफ़ी प्रभावित हुई. बहुत से सड़कों पर कहीं फिसले फँसे कारों से अफ़रा तफ़री मची और इससे भी ज़्यादा पैदल यात्रियों को गिरकर चोट लगी.

मगर क्या बताऊँ मेरे लिए तो इसी बर्फ़बारी से क्या कृपा हुई, आधा दिन छुट्टी मिल जाने की.
दो पहर को ही जल्दी घर वापसी, मामूल से कहीं ज़्यादा मुसीबत भरा रास्ता तै कर.
अब उम्मीद है कि बर्फ़बारी के साथ वसंत की आहटें क़रीब आ रही हैं.
शीत ऋतु के समाप्त होते जाने वाली इस अवधि के लिए यहाँ की एक कहावत है, "三寒四温 (सान-कान शी-ओन)", यानी हफ़्ते में आती हैं तीन दिन सर्दी तो फिर चार दिन नर्मी, जिस तरह मौसम आगे पीछे होकर बदलता जाता है.
मगर क्या बताऊँ मेरे लिए तो इसी बर्फ़बारी से क्या कृपा हुई, आधा दिन छुट्टी मिल जाने की.
दो पहर को ही जल्दी घर वापसी, मामूल से कहीं ज़्यादा मुसीबत भरा रास्ता तै कर.
अब उम्मीद है कि बर्फ़बारी के साथ वसंत की आहटें क़रीब आ रही हैं.
शीत ऋतु के समाप्त होते जाने वाली इस अवधि के लिए यहाँ की एक कहावत है, "三寒四温 (सान-कान शी-ओन)", यानी हफ़्ते में आती हैं तीन दिन सर्दी तो फिर चार दिन नर्मी, जिस तरह मौसम आगे पीछे होकर बदलता जाता है.
जनवरी 01, 2012
नववर्ष २०१२ की शुभ्कामनाएँ
नी-सेन जू-नी नेन
आकेमाशीते
ओमेदेतो
गोज़ाईमासू
आकेमाशीते
ओमेदेतो
गोज़ाईमासू
प्रार्थना है कि इस साल भी आप के घर में सुख-शांति बनी रहे.
अगस्त 16, 2011
दक्षिण कोरियाई थिएटरों में "3 Idiots"
जब दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के गिम्पो हवाई अड्डे पर था, उड़ान के वक़्त तक थोड़ा टाइम बिताने को हवाई अड्डे से जुड़े शौपिंग मॉल के अंदर यों ही घूम रहा था, और फिर वहाँ के मल्टीप्लेक्स तक आ पहुँचा, तो अचानक नज़र पड़ी इस विज्ञापन बोर्ड पर.
पता चला है कि 18 अगस्त से दक्षिण कोरिया के सिनेमा घरों में "3 Idiots" रिलीज होने वाली है, जिसका कोरियाई टाइटल "세 얼간이 (से ओल्गानी)" है.
आजकल दक्षिण कोरिया भारत के साथ आर्थिक संबंध बहुत क़रीब और मज़बूत बनाता नज़र आ रहा है, सो कुछ इस तरह मनोरंजन के रूप में भी प्रचार-जुड़ाव होना स्वाभाविक तो होगा ही, मगर क्यों यह फ़िल्म दक्षिण कोरिया में अब थिएटर रिलीज की जा रही है?
लगता है, एक बड़ा वजह यह होगा कि जब भारत और कई भारतीय बहु-प्रवासी देशों में लगभग डेढ़ साल पहले रिलीज हुई तभी बॉक्सऑफिस में रिकॉर्ड-तोड़ ज़बरदस्त कामयाबी मिली (जैसे फ़िल्म के पत्रक पर बड़ी ज़िक्र होती है कि कोरियाई वोन में परिवर्तित 81.1 अरब तक भारत में कमाई हुई).
मगर इसके अलावा, शायद इस लिए भी कि फ़िल्म ने ऐसे मुद्दे उथाए, जैसे एलीट उच्चशिक्षा सिस्टम के बुरे प्रभाव, परिवारों की तरफ़ से छात्राओं पर पड़ने वाले मानसिक दबाव, और शिक्षण को लेकर पूरे समाज पर छाई मनोदशा, आदि. दक्षिण कोरिया के समाज में भी ऐसी मनोदशा बहुत गहेरी होती है कि अपने संतानों के अच्छी नौकरी मिलने के लिए माँ-बाप शिक्षण पर बहुत ज़ोर देते हैं, आर्थिक तथा मानसिक दोनों रूप में. हो सकता है कि फ़िल्म प्रचालक कंपनी का ऐसा इरादा रहा हो कि यह फ़िल्म वहाँ के लोगों को कुछ जागृत करे और दूसरे समाज की तुलना अपने ही समाज की समस्याओं पर ग़ौर करने का मौक़ा बने.
पता चला है कि 18 अगस्त से दक्षिण कोरिया के सिनेमा घरों में "3 Idiots" रिलीज होने वाली है, जिसका कोरियाई टाइटल "세 얼간이 (से ओल्गानी)" है.
आजकल दक्षिण कोरिया भारत के साथ आर्थिक संबंध बहुत क़रीब और मज़बूत बनाता नज़र आ रहा है, सो कुछ इस तरह मनोरंजन के रूप में भी प्रचार-जुड़ाव होना स्वाभाविक तो होगा ही, मगर क्यों यह फ़िल्म दक्षिण कोरिया में अब थिएटर रिलीज की जा रही है?
लगता है, एक बड़ा वजह यह होगा कि जब भारत और कई भारतीय बहु-प्रवासी देशों में लगभग डेढ़ साल पहले रिलीज हुई तभी बॉक्सऑफिस में रिकॉर्ड-तोड़ ज़बरदस्त कामयाबी मिली (जैसे फ़िल्म के पत्रक पर बड़ी ज़िक्र होती है कि कोरियाई वोन में परिवर्तित 81.1 अरब तक भारत में कमाई हुई).
मगर इसके अलावा, शायद इस लिए भी कि फ़िल्म ने ऐसे मुद्दे उथाए, जैसे एलीट उच्चशिक्षा सिस्टम के बुरे प्रभाव, परिवारों की तरफ़ से छात्राओं पर पड़ने वाले मानसिक दबाव, और शिक्षण को लेकर पूरे समाज पर छाई मनोदशा, आदि. दक्षिण कोरिया के समाज में भी ऐसी मनोदशा बहुत गहेरी होती है कि अपने संतानों के अच्छी नौकरी मिलने के लिए माँ-बाप शिक्षण पर बहुत ज़ोर देते हैं, आर्थिक तथा मानसिक दोनों रूप में. हो सकता है कि फ़िल्म प्रचालक कंपनी का ऐसा इरादा रहा हो कि यह फ़िल्म वहाँ के लोगों को कुछ जागृत करे और दूसरे समाज की तुलना अपने ही समाज की समस्याओं पर ग़ौर करने का मौक़ा बने.
मई 01, 2011
तब धुँआ निकला तो....

बेशक आप सभी को नाम तो पता होगा, फ़ुकुशिमा दाइ-ईची (प्रथम) परमाणु संयंत्र. विकिरण संकट का उपरिकेंद्र, जहाँ पिछले महीने भूकंप-त्सुनामी के अगले दिन अचानक एक रिएक्टर भवन के छत और दीवार फटे, फिर धुँए के साथ-साथ कई रेदियोधार्मिक पदार्थ बाहर फिज़ाओं में रिस जाने लगे.

अब इस अनहोनी दुर्घटना के छोड़े अनहोनी दुष्प्रभाव का भोज, सँभालने को देशवासियों के लिए बेहद ज़्यादा ही पड़ रहा हैं. उनमें से एक है, भारी संख्या में लोगों की पलायन. फ़ुकुशिमा में बहुत से गाँवों-शहरों के बासिंदों को कुछ ही अपने सामान लिए अपने घर छोड़ना पड़ा, और अब बड़े पैमाने पर लोग नौकरियों-कारख़ानों से लेकर खेतों-पशुओं तक सरासर अपनी आजीविका खोने के कगार पर अचानक धकेल दिए गए हैं.
यही है प्राकृतिक आपदा में उपजे मानवकृत संकट, जिसे न कहें चोट पर लगे नमक बल्कि शायद सही कहें तो तेज़ाब, क्योंकि इसका दाग़ लंबे अरसे से, सोचो ज़िंदगी भर, कहीं न कहीं तो रह जाता है और आप को पता लगाना बेहद नामुमुकिन होता है कि इस दाग़ कहाँ कहाँ लग गया और उसका असर आगे कब, कितना, और कैसा पड़ेगा.
विकिरण का इस "दाग़" सिर्फ़ शारीरिक प्रभाव की बात तक ही सीमित नहीं हो रहा है. अब विकिरण के चिंता के मारे, बाज़ार में बहुत से ऐसे कृषि और मत्स्य उत्पादों का भाड़ी नुक़सान पड़ रहा है, जिनके उत्पादक रेडियोधर्मी पदार्थों के फैलाव से काफ़ी दूर होते है, और न किसी असामान्य से अधिक मात्राओं में ऐसे पदार्थ पाए गए हैं, न कि विकिरण से प्रोदूषित होने का कोई सँभावना होता. लेकिन ऐसे उत्पाद के दाम बाज़ार में आडे से भी कम तक घटे, या कुछ उत्पाद बिल्कुल विधिक रूप में प्रतिबंधित न होते हुए भी सौदागरों से अचानक इनकार किए जाने लगे.
ख़ासकर अभी विदेश में जापान से आयातित उत्पादों (बेशक विकिरण-अप्रभावित क्षेत्रों के होते भी) के लिए विकिरण-मुक्त सुरक्षा प्रमाणपत्र जैसी कुछ शर्तें लगाई जाती हैं तो ज़्यादातर उत्पादकों- निर्यातकों को कभी अपने लाभ से ज़्यादा क़ीमत चुकाने वाले इस प्रमाण के कारण विदेशी व्यापार से हाथ खींचना पड़ रहा है. वह भी तौलिये जैसे अखाद्य औद्योगिक उत्पाद तक शामिल है.
डरना तो ज़रूरी होगा और किसी को भी ऐसे जोखिम उठाने का फ़ायदा भी नहीं है. मगर असल में "जोखिम" क्या होता है और कहाँ तक इससे डरना सही होता है, यह पता लगाना भी बहुत ज़रूरी है. वरना "फ़ू-हियो ही-गाइ (風評被害)", जापानी में अर्थात "अफ़वाह से पहुँचने वाले नुक़सान" के शिकार रहे लोगों को कोई चारा नहीं मिलेगा.
इसके अलावा ऐसे लोग भी कम नहीं थे जो अपनी सुरक्षा सुनिश्चित बनाने के इरादे में स्वेच्छा से कहीं घर से दूर गए, या तो देश के दूसरे कोने पर हो या विदेश में. वैसे, फ़ुकुशिमा संयंत्र के आपात स्थिति बताई जाने के फ़ौरन बाद तोक्यो के हवाई अड्डों से विदेश नागरिकों की बड़ी पलायन भी हुई. शायद कोई जापानी लोग भी विदेशी सहकर्मियों-मित्रों के जापान से भागकर रवाना हुए देखकर थोड़ा बहुत हैरान हुए होंगे.
इस पृष्ठभूमि में कई कारण तो हैं, जैसे पश्चिम देशों के लोगों को चेरनोबिल दुर्घटना की ताज़ा याद होती है, और तत्कालीन हलचल में जानकारी काफ़ी नहीं मिलती थी इस लिए ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षित उपाय लिया गया होगा. वैसे, बहुत ही देशों की सरकारों ने अपने सहनागरिकों को जापान से शरण लेने के लिए उच्च चेतावनी (या आदेश तक) जारी की गई थी, और कई देशों ने अपने तोक्यो-स्थित दूतावास भी बंद किए थे.
फिर भी कुछ हद तक यह भी सच है कि कहीं ज़्यादा लापरवाही बरते मीडिया वालों के हाथ से ढलकी थी चिंताओं की पेट्रोल, जिस वजह हलचल में आग लग गई. मेरा मतलब यह नहीं है कि सारे के सारे मीडिया वालों ने तभी अपने दर्शकों-पाठकों को डराने-उकसाने जैसा ग़लत काम ही किया. उनमें से बहुत लोग सराहनीय ढंग से अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारी अच्छी तरह नभाई है जबकि थोड़े ही हिस्से कुछ लापरवाह रहे होंगे. लेकिन थोड़े क्यों न हों, ऐसे कवरेज से कुछ हद तक बड़े-बड़े दुष्प्रभाव मच गए भी होंगे.
बहुत प्रवासी लोगों, जो दशकों से जापान में बसे हैं और जापानी भाषा भी काफ़ी समझते हैं, ने अपने ही मूल देश के मीडिया से ऐसे कवरेज पर संशोधन करने को अनुरोध किया हैं, जो कुछ ग़लतफ़हमी के बुनियाद पर बने हों या ज़्यादा लापरवाह और संसानीखेज़ साबित हुए हों (जैसे इटली का उदाहरण). व्यक्तिगत ब्लोगों के अलावा, "वाल ऑफ़ शेम" जैसे वेबसाइटों पर सामूहिक तौर पर बहुत से कवरेज को दर्ज किया गया है. उस वेबसाइट पर मुझे बहुत कवरेज का पता चला, जिनमें से ख़ासकर नीचे वाली सीएनएन की दो वीडियो रिपोर्ट बहुत बुरी लगी.
समझता हूँ कि पत्रकार भी इंसान है तो विकिरण के डर में कुछ घबरा भी जाएगा, लेकिन मानता भी हूँ कि ऐसा व्यवहार तो कम से कम ऑफ़ लाइन के वक़्त पर करना चाहिए था, नहीं???
पता नहीं, विवादित कंपनी के दफ़्तर नहीं तो हॉस्टल जाके क्या कॉमेंट लेना चाहती थी..., धमकी लेने वाले बेचारे कर्मचारियों से, वह भी ऑफ ड्यूटी के दिन पर ??? दरवाज़े तक निजी परिसर में घुस आके कुछ पत्रकारिता और क़ानून के भी हद से आगे बढ़ गई...
और यह बुरा तो नहीं, बस ऐसा लगा है कि क्या है यही भाषायी संदर्भ में कुछ "टिपिकल अमेरिकन" रवैया ??? अपने बगल में अनुवादक होते भी क्या "लैंग्वेज बरियर" ?
सीएनएन और उन संवाददाताओं से कोई दुश्मनी नहीं है. ताहम ऐसी पत्रकारिता का बुरा परिणाम तो आखिरकार जापानी समाज को भुगतना पड़ रहा है, तो उन्हें कुछ निर्दोष माना नहीं जा सकता. वैसे, न्यूज़वीक पत्रिका के जापानी संस्करण के संपादकों ने ऐसे कई पश्चिमी देशों के मीडिया के साथ अपनी शिकायत ज़ाहिर की. (मूल जापानी लेख; एक चिट्ठाकार द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवादित लेख, जहाँ टिप्पणियाँ अनुभाग में अंग्रेज़ी-भाषी प्रवासियों के बीच हुई गर्मागर्म बहस भी कुछ देखने लायक है.)
लेकिन विदेशी मीडिया पर ही दोषी ठहराना उचित नहीं है. जापानी मीडिया में भी ऐसा कुछ हुआ, जैसे एक पत्रिका के कवर पन्ने पर कहीं ज़्यादा ही सनसनीख़ेज़ और डरावनी फ़ोटो छाप लिया गया जिसे लेकर काफ़ी तेज़ बहस छिड़ी और निंदा की गई तो पत्रिका के संपादकों को अपनी पत्रिका और वेबसाइट पर माफ़ी माँगनी पड़ी.

अधिकांश तौर पर जापानी केंद्रीय सरकार का भी कोई औचत्य नहीं है, ख़ासकर मंत्रियों और ऑफिसरों के बीच अंदरूनी गड़बड़ाहट-अव्यवस्था पर, जिस वजह से देश-विदेश दोनों तरफ़ से पब्लिक को सरकार द्वारा घोषित जानकारी पर बड़े संदेह पैदा हुआ है.
खैर, जब पिछले महीने परमाणु संयंत्र संकट के खतरे पर हलचल मच रहा था, तभी कई मीडिया वालों ने ठीक से पत्रकार की अपनी भूमिका और सामाजिक दायत्व निभा नहीं पाई, कुछ ग़लती से, कुछ भयभीत मन से, या कुछ लाभ की चाह में. कारण जो भी, सबक़ के लिए याद रखनी होगी.
अप्रैल 11, 2011
है वसंत आत्मसंयम का...
इस साल भी तोक्यो में आ गया है हवा की नरमाहट में फूलों से भरपूर होने वाला बहार का मौसम. इन दिनों शहर के हर कोने में साकुरा यानी चेरी के पेड़ों पर घने से घने खिले पाए जाते हैं, फूल हलके से गुलाबी रंग के, जैसे सब मामूली सी, हमेशा की तरह ही.

मगर अब साकुरा के फूल दिखते कुछ अलग हैं. हाँ, फूल का रंगोरूप तो ज़रूर कुछ बदला ही नहीं है, बल्कि बदले शायद हम हैं फूल देखने वाले और हमारा समाज. बहुत कुछ बदले हैं कहीं न कहीं उसी दिन से, जब पिछले महीने भूकंप और त्सुनामी से तबाही घठी और इससे अकल्पनीय स्तर से भाड़ी नुकसान पड़ा.
आज उस क़यामत वाले दिन से पूरा एक महीना हुआ. दोपहर 2:46 बजे, जिस वक़्त पर ठीक एक महीने पहले 11 मार्च को वह भूकंप हो उठा, देश भर में कुछ पल का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई. इस एक महीने का अरसा मुझे कुछ जल्दी से बीता लग रहा है, पर वास्तविक अवधि से कुछ लंबा सा भी लग रहा है. इस दौरान हालात ऐसा था कि लोग कुछ सदमे से निकल तो पाए फिर भी रोज़मर्रे ज़िंदगी में कहीं उथलपुथल तो होती रही. अब पहले की तरह साधारणता लोगों के जनजीवन में वापस आने लगी है, कम से कम तोक्यो में तो. यहाँ के निवासी लोग पीड़ित इलाकों से कहीं दूर है और ऐसे इलाकों की तुलना काफ़ी आरामदेह हालात में रह पा रहे हैं.
हालांकि इस आपदा के परिणामों के बारे में टीवी और इंटरनेट समाचार के ज़रिए लोग काफ़ी सूचित किए जाते रहे हैं. अगर आप यहाँ जापान में रहें और कुछ घंटों के लिए ही टीवी पर समाचार देखते रहें तो शायद ख्वामख्वाह समझ जाएँगे कि भूकंप, त्सुनामी या विकिरण, या फिर तीनों से पीड़ित इलाकों में हालत अभी भी कितनी गंभीर होती रही है और वहाँ लोग कैसी बड़ी मुसीबतों से जूझ रहे हैं. मुझे लगता है कि अब जनता के बीच बड़ी सहानुभूति जगी हुई है और बहुत से लोग पीड़ित लोगों की मदद या हौसला अफ़जाई के लिए जो भी कार्य अपनी क्षमता से हो सकें करने लगे हैं.
इस सिलसिले में एक रुझान अब समाज में उभर कर सामने आया है. कुछ ऐसे कार्य (कम से कम सार्वजनिक में) बिल्कुल बंद करने या कुछ सामान्य से अत्यंत नम्रता से किए जाने लेगे हैं, जैसाकि कोई पार्टी या त्यौहार आदि अवसरों पर शोर मचाना, मस्ती करना और फिर मज़ा लेना, आदि. ख़बरों में बताया जा रहा है कि होटलों और शौपिंग मॉलों में कुछ कम लोग आते हैं और शादी की रस्मों और पर्यटक यात्राओं की बुकिंग भी बड़े पैमाने पर ग्राहोकों की तरफ़ से रद्द की जा रही हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े-बड़े उत्सव भी कैंसल हो जाते हैं और कई उत्सव सामान्य से अधिक शांतिपूर्वक शैली में या पूरी तरह से असार्वजानिक रूप में मनाए जाते हैं.
माना जा रहा है कि इस बदलाव की पृष्ठिभूमि में लोगों की ऐसी मानसिकता है कि पीड़ित लोगों की भावनाओं पर ध्यान देते हुए हम आम नागरिकों को अपनी जनजीवन में संयम बरतनी चाहिए क्योंकि पीड़ित इलाकों में लोग बहुत गंभीर परिस्तिथियाँ सह रहे हैं और संघर्षों के पीछे कहीं न कहीं चिंता और उदासी में डूबे हैं. इसके अलावा कुछ अमली वजहात भी रही हैं, जैसे पिछले हफ़्ते तक तोक्यो समेत कई पड़ोस क्षेत्रों में रोलिंग अंधकार की आशंका होती रही थी जिसके कारण यातायात और कुछ सामाजिक कार्य में बड़ी दिक्क़तें पेश आई थीं. यही प्रवृति बस एक शब्द "जिशूकू (自粛)" यानी "आत्मासंयम" से संक्षेप में वर्णन की जाती है (और वैसे, न्यूयॉर्क टाइम्स और बीबीसी समेत कई अंग्रेज़ी मीडिया में भी इस जापानी शब्द के अंग्रेज़ीकृत "jishuku" का परिचय हो रहा है).
हो सकता है कि कहीं लोग सक्रिय रूप में बर्दाश्त करते हों, या कहीं आलोचना की झंझट से बचने के लिए ही ऐसा करते हों. पर मुख्य कारण जो भी हो, अब इस जिशूकू वाली प्रवृति और इसका प्रभाव देश भर में समा रहे हैं, किसी तरह की व्यक्तिगत गतिविधियों से लेकर निजी कंपनियों के व्यापारों तथा पब्लिक पॉलिसी तक.
वैसे, इस साकुरा के मौसम में अकसर लोग फूल देखने को पेड़ के नीचे चले आते हैं और कभी छुट्टी में अपने सहकर्मियों या दोस्तों-परिवारों के साथ खली हवा में खानपान भी किया जाता है. लेकिन इस साल तो कुछ थोड़े ही लोग समूह बनाके बैठे पाए जाते हैं. और यहाँ तक कि पिछले महीने तोक्यो के राज्यपाल ने एक पत्रकार सम्मेलन में मीडिया से कहा कि "साकूरा के फूल खिल गए तो क्या, आओ ज़रा एक गिलास शराब पीके ख़ूब गपशप करें, अभी ऐसी स्थिति में नहीं हैं हम", और इस टिप्पणी के बाद तोक्यो स्थानीय सरकार द्वारा प्रबंधित कई पार्कों में ऐसा आधिकारिक निर्देश भी जारी किया गया है कि वहाँ कुछ पार्टी की तरह ख़ूब मस्ती न करें. और उन पार्कों में हर शाम को साकुरा के पेड़ों पर लाइट अप होता था, जिस सेवा को भी बिजली बचत उपाय के तौर पर बंद किया गया है.
ऐसी जिशूकू वाली प्रतिक्रिया को लेकर काफ़ी तर्क-वितर्क भी हो रहे हैं. विरोधियों का कहना है कि देश भर में लोग कुछ ज़्यादा से मनोरंजन और खरीदारी जैसे उपभोग कार्यों से आत्मसंयम रख रहे हैं. ऐसी प्रतिक्रिया पूरे देश की अर्थव्यवस्था से लेकर पीड़ित इलाकों के पुनर्निर्माण और अनेक पीड़ित लोगों की पुनरुत्थान प्रक्रियाओं तक पर दुष्प्रभाव ही डालेगी और इस लिए ऐसे अनहोनी दुष्चक्र में फँसने से बचना चाहिए. अब ऐसी आवाजें पीड़ित इलाकों से भी बहुत आ रही हैं (जैसे यहाँ), और मदद के लिए कुछ स्वेच्छा से वहाँ के उत्पाद खरीदने को प्रचार भी किया जा रहा है. जापानी सरकार ने भी "अति-आत्मसंयमित" लोगों के झुकाव को लेकर काफ़ी चिंता जताई है, जैसे एक सरकारी एजेंसी ने आयुक्त के नाम पर लोगों को प्रार्थना दी है कि "पूरे देश में शक्त बहाल करने के लिए" सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों से संयम न करें.
ऐसे बहस में मैं कहीं जिशूकू विरोधियों से सहमति रखता हूँ, पर कहीं उन विचारों से असहमत भी हूँ. तोक्यो राज्यपाल की तरह शासन की तरफ़ से संयम करवाना (वह भी कुछ कठोरता से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दबाव डालते हुए) तो बिल्कुल ग़लत और बेहूदा कोशिश है. ऐसे कहीं अर्ध अनिवार्य "आत्म"संयम में पीड़ित लोगों के लिए कोई फ़ायदा होगा भी नहीं. अगर होगा तो बस संयम करवाने वालों की आत्मसंतुष्टि का ही. मगर "ज़्यादा खर्च करो, देश बचाओ" वाले तर्क पर भी कुछ शक रहता है. अगरचे लोग और ज़्यादा पैसे निजी खरीदारी में खर्च कर डालेंगे इससे देश के अर्थव्यवस्था के लिए तो लाभ पैदा होगा ही, ऐसा लाभ तो न सीधा न पूरा पहुँचेगा पीड़ित इलाकों के क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था तक और हर एक पीड़ित तक. कुछ ऐसा भी दिख जाता है, मानो "पीड़ितों के हित" को कहीं बहाना बनाया जा रहा हो. मेरा कहेने का मतलब है कि पीड़ित इलाकों की चीज़ें खरीदकर वहाँ के उत्पादकों का सहारा देना तो बिल्कुल ठीक है मगर इस लाभ की पहुँच कुछ आंशिक रूप से बड़ी कंपनियों और अमीर तबकों तक ही सीमित न रहे. आखिर, निजी उपभोग को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ावा दिया जाता रहे भी हद तो होगी और उसपर ज़्यादा निर्भर भी नहीं कर सकेंगे, और सरकार के अपनी ख़ासा भूमिका निभाए बिना पूरे से पूरे पीड़ित इलाकों को, और सारे के सारे पीड़ित लोगों को सहारा देते रहना बेहद मुशकिल होगा.
और, जिशूकू वाली व्यक्तिगत तथा सामाजिक मनोदशा को पूरी तरह नकार न दे पाने का (और ऐसा करना भी न चाहने का) एक और कारण भी है. मेरा मानना है कि इतनी शोकपूर्ण घटनाओं के बाद कुछ थोड़ा-बहुत भावुक होना, दूसरों के दर्द को समझना, उनका साथ देते हुए कहीं शोक में डूब जाना, और शोक मनाने की तरह कुछ कार्यों का आत्मसंयम भी रखना. यही तो गैर-पीड़ित लोगों की भी बहुत स्वाभाविक प्रतिक्रिया और मनोवृत्ति होगी.
अब पुनर्निर्माण की गति को लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि लोगों को अपने-अपने ग़मों से बमुश्किल समझौता कर पाने में काफ़ी देर तो लगेगी और अपनी-अपनी मुसीबतों से कोई जल्दी से निपट पाएगा तो कोई आहिस्ते से. क्योंकि इस बार की आपदा में ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जिनके अपने अज़ीज़ त्सुनामी आने के बाद लापता हो गए हैं और शायद त्सुनामी में दूर बह जाने की वजह अब तक उनकी लाशें तक नहीं मिल रही हैं. ऐसे लोग चाहे कितनी बार भी अनजाने मृतकों को तो श्रद्धांजलि देते रहें, पर अपने प्रियों के लिए ही न अंतिम संस्कार कर सके हैं, नकि ऐसे अवसर पर ठीक से उनकी मृत्यु का शोक भी मना सके हैं.
बहुत लोग अब भी सुबह से शरणस्थल निकलकर तत्कालीन शावागारों में, मलबे बने घर या कर्मस्थल के आसपास या समुद्रतटों पर चले आते हैं और दिन ढलने तक ऐसा चक्कर लगाकर घूमते है. पीड़ित इलाकों में बहुत से लोग ऐसी ही बड़ी आस में शव की तलाश कर रहे हैं कि कहीं मर चुके तो भी कम से कम शव तो परिवार के पास लौटके आ जाए और पूर्वजों के साथ ख़ानदानी कब्र में ठीक से दफ़न कर लिया जाए.
शायद ऐसे लोगों के जीवन की घड़ी कहीं तो उस दिन से रुकी हुई होगी, जबकि समाज में बाकी लोगों को तो शोक से बाहर आने की अपनी-अपनी समयसीमा तय करके आगे चलना ही होगा. फिर भी, मेरा और दूसरों का यह अरमान रहेगा कि चाहे कितनी देर तक उनके क़दम वहीं ठहरते जाएँगे भी, कभी न उन्हें आगे बढ़ाने को कोई जल्दबाज़ी हो न कि उन्हें खींच-खींच के मज़बूरी में बढ़ाया जाए, और बस समाज की तरफ़ से इंतज़ार किया जाता रहे. आज और भविषय में शहर के पुनर्निर्माण के चलते हुए , ऐसा नहीं होने दिया जाना चाहिए, जैसाकि तब भी शोक में डूबे लोगों को समाज के किनारों पर धकेल दिया जाता हो और ऐसे लोगों को कहीं पिछड़ता हुआ महसूस कराया जाता हो.
चलो, अब बात कुछ ज़्यादा लंबी हो गई....

तो, फिर से ज़रा देखें, मज़ा भी लें, बहार के चंद नज़ारे हैं साकुरा और अन्य फूलों के.






भूकंप और त्सुनामी से ग्रस्त उत्तर-पूर्वी इलाकों से भी अब साकुरा के खिलने की ख़बरें आने लगी हैं. ए फूलो, वहाँ किसी के दुःख दर्द को कुछ हल्का तो कर दें, अगर भुला ही न सकें भी.
मगर बिल्कुल अच्छा हुआ, कम से कम फूल तो अपने ख़ूब रंग दिखाने से जिशूकू कभी नहीं करते...

मगर अब साकुरा के फूल दिखते कुछ अलग हैं. हाँ, फूल का रंगोरूप तो ज़रूर कुछ बदला ही नहीं है, बल्कि बदले शायद हम हैं फूल देखने वाले और हमारा समाज. बहुत कुछ बदले हैं कहीं न कहीं उसी दिन से, जब पिछले महीने भूकंप और त्सुनामी से तबाही घठी और इससे अकल्पनीय स्तर से भाड़ी नुकसान पड़ा.
आज उस क़यामत वाले दिन से पूरा एक महीना हुआ. दोपहर 2:46 बजे, जिस वक़्त पर ठीक एक महीने पहले 11 मार्च को वह भूकंप हो उठा, देश भर में कुछ पल का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई. इस एक महीने का अरसा मुझे कुछ जल्दी से बीता लग रहा है, पर वास्तविक अवधि से कुछ लंबा सा भी लग रहा है. इस दौरान हालात ऐसा था कि लोग कुछ सदमे से निकल तो पाए फिर भी रोज़मर्रे ज़िंदगी में कहीं उथलपुथल तो होती रही. अब पहले की तरह साधारणता लोगों के जनजीवन में वापस आने लगी है, कम से कम तोक्यो में तो. यहाँ के निवासी लोग पीड़ित इलाकों से कहीं दूर है और ऐसे इलाकों की तुलना काफ़ी आरामदेह हालात में रह पा रहे हैं.
हालांकि इस आपदा के परिणामों के बारे में टीवी और इंटरनेट समाचार के ज़रिए लोग काफ़ी सूचित किए जाते रहे हैं. अगर आप यहाँ जापान में रहें और कुछ घंटों के लिए ही टीवी पर समाचार देखते रहें तो शायद ख्वामख्वाह समझ जाएँगे कि भूकंप, त्सुनामी या विकिरण, या फिर तीनों से पीड़ित इलाकों में हालत अभी भी कितनी गंभीर होती रही है और वहाँ लोग कैसी बड़ी मुसीबतों से जूझ रहे हैं. मुझे लगता है कि अब जनता के बीच बड़ी सहानुभूति जगी हुई है और बहुत से लोग पीड़ित लोगों की मदद या हौसला अफ़जाई के लिए जो भी कार्य अपनी क्षमता से हो सकें करने लगे हैं.
इस सिलसिले में एक रुझान अब समाज में उभर कर सामने आया है. कुछ ऐसे कार्य (कम से कम सार्वजनिक में) बिल्कुल बंद करने या कुछ सामान्य से अत्यंत नम्रता से किए जाने लेगे हैं, जैसाकि कोई पार्टी या त्यौहार आदि अवसरों पर शोर मचाना, मस्ती करना और फिर मज़ा लेना, आदि. ख़बरों में बताया जा रहा है कि होटलों और शौपिंग मॉलों में कुछ कम लोग आते हैं और शादी की रस्मों और पर्यटक यात्राओं की बुकिंग भी बड़े पैमाने पर ग्राहोकों की तरफ़ से रद्द की जा रही हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े-बड़े उत्सव भी कैंसल हो जाते हैं और कई उत्सव सामान्य से अधिक शांतिपूर्वक शैली में या पूरी तरह से असार्वजानिक रूप में मनाए जाते हैं.
माना जा रहा है कि इस बदलाव की पृष्ठिभूमि में लोगों की ऐसी मानसिकता है कि पीड़ित लोगों की भावनाओं पर ध्यान देते हुए हम आम नागरिकों को अपनी जनजीवन में संयम बरतनी चाहिए क्योंकि पीड़ित इलाकों में लोग बहुत गंभीर परिस्तिथियाँ सह रहे हैं और संघर्षों के पीछे कहीं न कहीं चिंता और उदासी में डूबे हैं. इसके अलावा कुछ अमली वजहात भी रही हैं, जैसे पिछले हफ़्ते तक तोक्यो समेत कई पड़ोस क्षेत्रों में रोलिंग अंधकार की आशंका होती रही थी जिसके कारण यातायात और कुछ सामाजिक कार्य में बड़ी दिक्क़तें पेश आई थीं. यही प्रवृति बस एक शब्द "जिशूकू (自粛)" यानी "आत्मासंयम" से संक्षेप में वर्णन की जाती है (और वैसे, न्यूयॉर्क टाइम्स और बीबीसी समेत कई अंग्रेज़ी मीडिया में भी इस जापानी शब्द के अंग्रेज़ीकृत "jishuku" का परिचय हो रहा है).
हो सकता है कि कहीं लोग सक्रिय रूप में बर्दाश्त करते हों, या कहीं आलोचना की झंझट से बचने के लिए ही ऐसा करते हों. पर मुख्य कारण जो भी हो, अब इस जिशूकू वाली प्रवृति और इसका प्रभाव देश भर में समा रहे हैं, किसी तरह की व्यक्तिगत गतिविधियों से लेकर निजी कंपनियों के व्यापारों तथा पब्लिक पॉलिसी तक.
वैसे, इस साकुरा के मौसम में अकसर लोग फूल देखने को पेड़ के नीचे चले आते हैं और कभी छुट्टी में अपने सहकर्मियों या दोस्तों-परिवारों के साथ खली हवा में खानपान भी किया जाता है. लेकिन इस साल तो कुछ थोड़े ही लोग समूह बनाके बैठे पाए जाते हैं. और यहाँ तक कि पिछले महीने तोक्यो के राज्यपाल ने एक पत्रकार सम्मेलन में मीडिया से कहा कि "साकूरा के फूल खिल गए तो क्या, आओ ज़रा एक गिलास शराब पीके ख़ूब गपशप करें, अभी ऐसी स्थिति में नहीं हैं हम", और इस टिप्पणी के बाद तोक्यो स्थानीय सरकार द्वारा प्रबंधित कई पार्कों में ऐसा आधिकारिक निर्देश भी जारी किया गया है कि वहाँ कुछ पार्टी की तरह ख़ूब मस्ती न करें. और उन पार्कों में हर शाम को साकुरा के पेड़ों पर लाइट अप होता था, जिस सेवा को भी बिजली बचत उपाय के तौर पर बंद किया गया है.
ऐसी जिशूकू वाली प्रतिक्रिया को लेकर काफ़ी तर्क-वितर्क भी हो रहे हैं. विरोधियों का कहना है कि देश भर में लोग कुछ ज़्यादा से मनोरंजन और खरीदारी जैसे उपभोग कार्यों से आत्मसंयम रख रहे हैं. ऐसी प्रतिक्रिया पूरे देश की अर्थव्यवस्था से लेकर पीड़ित इलाकों के पुनर्निर्माण और अनेक पीड़ित लोगों की पुनरुत्थान प्रक्रियाओं तक पर दुष्प्रभाव ही डालेगी और इस लिए ऐसे अनहोनी दुष्चक्र में फँसने से बचना चाहिए. अब ऐसी आवाजें पीड़ित इलाकों से भी बहुत आ रही हैं (जैसे यहाँ), और मदद के लिए कुछ स्वेच्छा से वहाँ के उत्पाद खरीदने को प्रचार भी किया जा रहा है. जापानी सरकार ने भी "अति-आत्मसंयमित" लोगों के झुकाव को लेकर काफ़ी चिंता जताई है, जैसे एक सरकारी एजेंसी ने आयुक्त के नाम पर लोगों को प्रार्थना दी है कि "पूरे देश में शक्त बहाल करने के लिए" सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों से संयम न करें.
ऐसे बहस में मैं कहीं जिशूकू विरोधियों से सहमति रखता हूँ, पर कहीं उन विचारों से असहमत भी हूँ. तोक्यो राज्यपाल की तरह शासन की तरफ़ से संयम करवाना (वह भी कुछ कठोरता से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दबाव डालते हुए) तो बिल्कुल ग़लत और बेहूदा कोशिश है. ऐसे कहीं अर्ध अनिवार्य "आत्म"संयम में पीड़ित लोगों के लिए कोई फ़ायदा होगा भी नहीं. अगर होगा तो बस संयम करवाने वालों की आत्मसंतुष्टि का ही. मगर "ज़्यादा खर्च करो, देश बचाओ" वाले तर्क पर भी कुछ शक रहता है. अगरचे लोग और ज़्यादा पैसे निजी खरीदारी में खर्च कर डालेंगे इससे देश के अर्थव्यवस्था के लिए तो लाभ पैदा होगा ही, ऐसा लाभ तो न सीधा न पूरा पहुँचेगा पीड़ित इलाकों के क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था तक और हर एक पीड़ित तक. कुछ ऐसा भी दिख जाता है, मानो "पीड़ितों के हित" को कहीं बहाना बनाया जा रहा हो. मेरा कहेने का मतलब है कि पीड़ित इलाकों की चीज़ें खरीदकर वहाँ के उत्पादकों का सहारा देना तो बिल्कुल ठीक है मगर इस लाभ की पहुँच कुछ आंशिक रूप से बड़ी कंपनियों और अमीर तबकों तक ही सीमित न रहे. आखिर, निजी उपभोग को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ावा दिया जाता रहे भी हद तो होगी और उसपर ज़्यादा निर्भर भी नहीं कर सकेंगे, और सरकार के अपनी ख़ासा भूमिका निभाए बिना पूरे से पूरे पीड़ित इलाकों को, और सारे के सारे पीड़ित लोगों को सहारा देते रहना बेहद मुशकिल होगा.
और, जिशूकू वाली व्यक्तिगत तथा सामाजिक मनोदशा को पूरी तरह नकार न दे पाने का (और ऐसा करना भी न चाहने का) एक और कारण भी है. मेरा मानना है कि इतनी शोकपूर्ण घटनाओं के बाद कुछ थोड़ा-बहुत भावुक होना, दूसरों के दर्द को समझना, उनका साथ देते हुए कहीं शोक में डूब जाना, और शोक मनाने की तरह कुछ कार्यों का आत्मसंयम भी रखना. यही तो गैर-पीड़ित लोगों की भी बहुत स्वाभाविक प्रतिक्रिया और मनोवृत्ति होगी.
अब पुनर्निर्माण की गति को लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि लोगों को अपने-अपने ग़मों से बमुश्किल समझौता कर पाने में काफ़ी देर तो लगेगी और अपनी-अपनी मुसीबतों से कोई जल्दी से निपट पाएगा तो कोई आहिस्ते से. क्योंकि इस बार की आपदा में ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जिनके अपने अज़ीज़ त्सुनामी आने के बाद लापता हो गए हैं और शायद त्सुनामी में दूर बह जाने की वजह अब तक उनकी लाशें तक नहीं मिल रही हैं. ऐसे लोग चाहे कितनी बार भी अनजाने मृतकों को तो श्रद्धांजलि देते रहें, पर अपने प्रियों के लिए ही न अंतिम संस्कार कर सके हैं, नकि ऐसे अवसर पर ठीक से उनकी मृत्यु का शोक भी मना सके हैं.
बहुत लोग अब भी सुबह से शरणस्थल निकलकर तत्कालीन शावागारों में, मलबे बने घर या कर्मस्थल के आसपास या समुद्रतटों पर चले आते हैं और दिन ढलने तक ऐसा चक्कर लगाकर घूमते है. पीड़ित इलाकों में बहुत से लोग ऐसी ही बड़ी आस में शव की तलाश कर रहे हैं कि कहीं मर चुके तो भी कम से कम शव तो परिवार के पास लौटके आ जाए और पूर्वजों के साथ ख़ानदानी कब्र में ठीक से दफ़न कर लिया जाए.
शायद ऐसे लोगों के जीवन की घड़ी कहीं तो उस दिन से रुकी हुई होगी, जबकि समाज में बाकी लोगों को तो शोक से बाहर आने की अपनी-अपनी समयसीमा तय करके आगे चलना ही होगा. फिर भी, मेरा और दूसरों का यह अरमान रहेगा कि चाहे कितनी देर तक उनके क़दम वहीं ठहरते जाएँगे भी, कभी न उन्हें आगे बढ़ाने को कोई जल्दबाज़ी हो न कि उन्हें खींच-खींच के मज़बूरी में बढ़ाया जाए, और बस समाज की तरफ़ से इंतज़ार किया जाता रहे. आज और भविषय में शहर के पुनर्निर्माण के चलते हुए , ऐसा नहीं होने दिया जाना चाहिए, जैसाकि तब भी शोक में डूबे लोगों को समाज के किनारों पर धकेल दिया जाता हो और ऐसे लोगों को कहीं पिछड़ता हुआ महसूस कराया जाता हो.
चलो, अब बात कुछ ज़्यादा लंबी हो गई....

तो, फिर से ज़रा देखें, मज़ा भी लें, बहार के चंद नज़ारे हैं साकुरा और अन्य फूलों के.






भूकंप और त्सुनामी से ग्रस्त उत्तर-पूर्वी इलाकों से भी अब साकुरा के खिलने की ख़बरें आने लगी हैं. ए फूलो, वहाँ किसी के दुःख दर्द को कुछ हल्का तो कर दें, अगर भुला ही न सकें भी.
मगर बिल्कुल अच्छा हुआ, कम से कम फूल तो अपने ख़ूब रंग दिखाने से जिशूकू कभी नहीं करते...
मार्च 17, 2011
कहीं धुंधुली सी है "साधारणता"
एक अख़बार के संपादक ने अपने संपादकीय लेख पर नीचे वाले सवाल डाला, जैसे अपने से और दोसरे पाठकों और सारे समाज से पूछ रहे.
पिछले शुक्रवार दोपहर में विनाशकारी महाभूकंप और त्सुनामी आने के बाद, अब पूरे पांच दिन हो गए हैं. यहाँ तोक्यो में तो सामायिक अव्यवस्था और आशंकाएँ जो शुक्रवार को घने से घने हो रही थीं अब काफ़ी कम हो जा रही हैं, जबकि उत्तर-पूर्वी जापान के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बचाव और जाँच के कार्य विस्तृत होते ही नई-नई जानकारियाँ हमारे सामने आने लगी हैं.
हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों से आने वाली ख़बरों में कई तो ऐसी हैं कि त्सुनामी-तबाही से पीड़ित शरणार्थियाँ कुछ दिनों से लापता रहे अपने-अपने परिवार सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त से आँसूभरी पुनर्मिलन कर पाए. फिर भी ज़्यादातर ख़बरें तो बेहद दर्दनाक ही होती रही हैं. जैसाकि, त्सुनामी-लहरों के बहाव में कौन-कौन निगले गए, कहाँ कितने-कितने शव मिले, और मलबों के बीच नष्ट हो चुके अपने घर से कैसे सामना करना पड़ा, आदि. दिनबदिन बढ़ती ही तो जाएगी मृतकों की संख्या. मगर इसके पीछे ज़रूर होती हैं असंख्या दुखद कहानियाँ, जिनमें से बस थोड़े ही अंश अब मीडिया में कथित हु होते हैं.
मुझे कुछ दृढ़ता से महसूस हो रहा है कि क़ुदरती मुसीबतों का क़हर तो क्यों न हो हमारी कल्पना के बाहर, उसी क़हर से आम लोगों की जो रोज़मर्रा ज़िंदगी बर्बाद की गई और उनकी जो वर्तमान में असहाय स्थितियाँ चल रही हैं, वही तो सब हमारी भी हो सकती थीं (और, बेशक, अभी भी आगे किसी वक़्त हो सकती हैं). शायद इसी वजह से मुतासिर लोगों की ग़मगीन दास्तानें कभी कभी सुनने-देखने को हमसे बर्दाश्त नहीं होती हैं...
जहाँ तक मेरी और आसपास शहर की हालत का सवाल है, पीड़ित लोगों से विपरीत वैसे हालत शायद कुछ बिगड़ी भी नहीं कही जा सकती. न मेरे घर में और नज़दीक दुकानों में ख़ुराक व पेट्रोल आदि ज़रूरी चीज़ें ख़त्म हुई हैं, न बिजली पानी और गैस की लाइनें बंद हुई हैं, न कि रात को अंधेरों में ठंड और भूख झेलनी पड़ी हैं. ऐसे मायने में तो अभी हमारी दैनिक जनजीवन में कोई गंभीरता नहीं आ रही है और एक नज़र तो बिल्कुल दिखता है जैसे सब कुछ ठीक-ठाक चल रहे हों.
हालांकि यक़ीनन भूकंप ने दिल में कहीं गहरे से अपना छाप छोड़ डाला है.
आफ्टरशॉक यानी मुख्या भूकंप के बाद आने वाले झटकों पर प्रतिक्रया होती है. इन दिनों बहुत अक्सर छोटे-मोटे झटके आते रहे हैं और जब कहीं झटकता महसूस हुआ तो इसके प्रति पहले की तुलना आजकल कई गुणा ज़्यादा सचेत हो रहा हूँ. तनाव भी कहीं ज़्यादा होती है. सरकारी एजेंसी की तरफ़ से चेतावनी दी जा रही है कि आगे कई दिनों में फिर से बड़े भूकंप होने की काफ़ी संभावना बची हुई है. सो, रात की नींद भी कहीं उथली होती है और हलके झटके से भी उड़ जाती है.
सामाजिक प्रभाव भी काफ़ी हो रहा है. जब कल खरीदारी करने सुपरमार्केट गया तो बोटल पानी से लेकर चावल रोटी और इन्स्टैंट नूडलज़ तक कई तरह के खाद्य पदार्थ उस दुकान के शेल्फ़ से बिल्कुल ग़ायब हो गए थे. रास्ते पर कई पेट्रोल स्टेशनों पर गाड़ियों की लंबी लाइन लगी हुई थी और खारीदारी पर दस लीटर तक का प्रतिबंध लगाया गया था.
परमाणु संयंत्र से रिस रहे रेडियोधर्मी पदार्थों को लेकर भी काफ़ी चिंता जताई जा रही है. अब हालत देखते ही देखते बद से बदतर हो जाती नज़र आ रही है. लोगों के बीच डर होता ज़रूर है, फिर भी वह किसी स्तर (और शायद किसी क्षेत्र) तक ही सीमित होता है.
इन चार-पांच दिनों से तोक्यो निवासियों को बिजली कटौती और इसकी आशंका ने सबसे ज़्यादा छेड़ा है. यह हालत इस कारण हुआ कि कई उर्जा संयंत्र बंद होने के बाद बिजली उत्पादन काफ़ी घट गया, और राजधानी क्षेत्र के लिए कमी हो रही है. अब पिछले सोमवार से बिजली कंपनी से ऐलान दी गई है कि तोक्यो और पड़ोसी आठ प्रांतों के विशाल क्षेत्र को अब पांच समूहों में बांटा जाता है और हर समूह के कई इलाकों में प्रतिदिन लगबग तीन घंटों के लिए बारी-बारी से बिजली कटौती होगी. जापान में ऐसी योजित बिजली कटौती की जाना, वह भी इतने बड़े पैमाने पर, बिल्कुल असामान्य बात है. इस लिए जनजीवन में अफरा-तफरी मच रही है.
इस तरह तोक्यो में भी, जहाँ आपदा प्रभावित क्षेत्रों से लोग शारीरिक और कुछ मानसिक रूप से दूर रहे हैं, कहीं न कहीं जनजीवन पर गहरा प्रभाव हो रहा है....
क्या यह अभी बुरा सपना देख रहे हैं हम ? या फिर, इस भारी तबाही मचने तक हम जिस लंबी नींद में सोए थे, उससे जागकर हक़ीक़त का सामना करने को है वक़्त ?जैसे इस सवाल ने एक दिशा सुझाई, शायद भाड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना कर हमें उसके भय और अपनी विवशता के सोच में डूबना छोड़ कुछ और करना बाकी है.
पिछले शुक्रवार दोपहर में विनाशकारी महाभूकंप और त्सुनामी आने के बाद, अब पूरे पांच दिन हो गए हैं. यहाँ तोक्यो में तो सामायिक अव्यवस्था और आशंकाएँ जो शुक्रवार को घने से घने हो रही थीं अब काफ़ी कम हो जा रही हैं, जबकि उत्तर-पूर्वी जापान के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बचाव और जाँच के कार्य विस्तृत होते ही नई-नई जानकारियाँ हमारे सामने आने लगी हैं.
हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों से आने वाली ख़बरों में कई तो ऐसी हैं कि त्सुनामी-तबाही से पीड़ित शरणार्थियाँ कुछ दिनों से लापता रहे अपने-अपने परिवार सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त से आँसूभरी पुनर्मिलन कर पाए. फिर भी ज़्यादातर ख़बरें तो बेहद दर्दनाक ही होती रही हैं. जैसाकि, त्सुनामी-लहरों के बहाव में कौन-कौन निगले गए, कहाँ कितने-कितने शव मिले, और मलबों के बीच नष्ट हो चुके अपने घर से कैसे सामना करना पड़ा, आदि. दिनबदिन बढ़ती ही तो जाएगी मृतकों की संख्या. मगर इसके पीछे ज़रूर होती हैं असंख्या दुखद कहानियाँ, जिनमें से बस थोड़े ही अंश अब मीडिया में कथित हु होते हैं.
मुझे कुछ दृढ़ता से महसूस हो रहा है कि क़ुदरती मुसीबतों का क़हर तो क्यों न हो हमारी कल्पना के बाहर, उसी क़हर से आम लोगों की जो रोज़मर्रा ज़िंदगी बर्बाद की गई और उनकी जो वर्तमान में असहाय स्थितियाँ चल रही हैं, वही तो सब हमारी भी हो सकती थीं (और, बेशक, अभी भी आगे किसी वक़्त हो सकती हैं). शायद इसी वजह से मुतासिर लोगों की ग़मगीन दास्तानें कभी कभी सुनने-देखने को हमसे बर्दाश्त नहीं होती हैं...
जहाँ तक मेरी और आसपास शहर की हालत का सवाल है, पीड़ित लोगों से विपरीत वैसे हालत शायद कुछ बिगड़ी भी नहीं कही जा सकती. न मेरे घर में और नज़दीक दुकानों में ख़ुराक व पेट्रोल आदि ज़रूरी चीज़ें ख़त्म हुई हैं, न बिजली पानी और गैस की लाइनें बंद हुई हैं, न कि रात को अंधेरों में ठंड और भूख झेलनी पड़ी हैं. ऐसे मायने में तो अभी हमारी दैनिक जनजीवन में कोई गंभीरता नहीं आ रही है और एक नज़र तो बिल्कुल दिखता है जैसे सब कुछ ठीक-ठाक चल रहे हों.
हालांकि यक़ीनन भूकंप ने दिल में कहीं गहरे से अपना छाप छोड़ डाला है.
आफ्टरशॉक यानी मुख्या भूकंप के बाद आने वाले झटकों पर प्रतिक्रया होती है. इन दिनों बहुत अक्सर छोटे-मोटे झटके आते रहे हैं और जब कहीं झटकता महसूस हुआ तो इसके प्रति पहले की तुलना आजकल कई गुणा ज़्यादा सचेत हो रहा हूँ. तनाव भी कहीं ज़्यादा होती है. सरकारी एजेंसी की तरफ़ से चेतावनी दी जा रही है कि आगे कई दिनों में फिर से बड़े भूकंप होने की काफ़ी संभावना बची हुई है. सो, रात की नींद भी कहीं उथली होती है और हलके झटके से भी उड़ जाती है.
सामाजिक प्रभाव भी काफ़ी हो रहा है. जब कल खरीदारी करने सुपरमार्केट गया तो बोटल पानी से लेकर चावल रोटी और इन्स्टैंट नूडलज़ तक कई तरह के खाद्य पदार्थ उस दुकान के शेल्फ़ से बिल्कुल ग़ायब हो गए थे. रास्ते पर कई पेट्रोल स्टेशनों पर गाड़ियों की लंबी लाइन लगी हुई थी और खारीदारी पर दस लीटर तक का प्रतिबंध लगाया गया था.
परमाणु संयंत्र से रिस रहे रेडियोधर्मी पदार्थों को लेकर भी काफ़ी चिंता जताई जा रही है. अब हालत देखते ही देखते बद से बदतर हो जाती नज़र आ रही है. लोगों के बीच डर होता ज़रूर है, फिर भी वह किसी स्तर (और शायद किसी क्षेत्र) तक ही सीमित होता है.
इन चार-पांच दिनों से तोक्यो निवासियों को बिजली कटौती और इसकी आशंका ने सबसे ज़्यादा छेड़ा है. यह हालत इस कारण हुआ कि कई उर्जा संयंत्र बंद होने के बाद बिजली उत्पादन काफ़ी घट गया, और राजधानी क्षेत्र के लिए कमी हो रही है. अब पिछले सोमवार से बिजली कंपनी से ऐलान दी गई है कि तोक्यो और पड़ोसी आठ प्रांतों के विशाल क्षेत्र को अब पांच समूहों में बांटा जाता है और हर समूह के कई इलाकों में प्रतिदिन लगबग तीन घंटों के लिए बारी-बारी से बिजली कटौती होगी. जापान में ऐसी योजित बिजली कटौती की जाना, वह भी इतने बड़े पैमाने पर, बिल्कुल असामान्य बात है. इस लिए जनजीवन में अफरा-तफरी मच रही है.
इस तरह तोक्यो में भी, जहाँ आपदा प्रभावित क्षेत्रों से लोग शारीरिक और कुछ मानसिक रूप से दूर रहे हैं, कहीं न कहीं जनजीवन पर गहरा प्रभाव हो रहा है....
मार्च 11, 2011
क़यामत-सा दिन
भूकंप के वक़्त घर पर था और बड़ी ख़ुश क़िस्मत थी कि सब सलामत रहे हैं हमारे यहाँ तो. लेकिन लोग बेहद ख़ौफ़ज़दा रह गए हैं. इतना ज़ोरदार झटका कभी आया नहीं था कि घर के अंदर तो क्या, बाहर सब नज़ारों में दुनिया हिल रही थी.
फ़िलहाल मोबाइल वग़ैरह फ़ोन सेवा तो सुस्त या बिल्कुल बंद हो रही है. नगरपालिका की तरफ़ से घोषणा मिली है कि बिजली भी कई क़रीब शहरों में बंद हो रही है. न्यूज़ में कह रहा है कि तबतक तोक्यो राजधानी क्षेत्र में कम्यूटर ट्रेन की लाइनों पर रोक लगाई जा रहेगी जबतक ट्रेन की पटरियों पर जाँच पूरी न हो, और टीवी पर घर लौटने को इच्छुक यात्रियों की बड़ी भीड़ स्टेशनों पर लगी हुई नज़र आ रही है. ऐसा भी कह रहा है कि यह रोक आज सारी रात के लिए हटेगी नहीं, इस लिए बदले में उपलब्ध किए जाने वाली बस सेवा और टक्सी पर लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं.
शाम ढलते ही अँधेरा छाया और साथ ही काफ़ी ठंड हो रही है. अभी शारीरिक रूप में तो ख़ासा नुक़सान नहीं हुआ, बल्कि मानसिक तौर पर कुछ प्रभाव हो रहा है. बहुत परेशान हो जाते हैं, जैसे बार बार टीवी न्यूज़ में तटीय इलाक़ों में त्सुनामी से मची तबाहियाँ देखकर, और, अब तक न थमने वाले भूकंपोत्तर लहरों को महसूस करके.
इन दसेक सालों में भूकंप की तबाहियों के बारे में अनगिनत ख़बरें देखा करता रहा था, पर पक्के मायने में तो तसव्वुर नहीं कर पाई थी और कहीं लगता था कि अपने ऊपर ऐसा नहीं होगा. अब ऐसा एहसास तो बिल्कुल नहीं रह गया है.
फ़िलहाल मोबाइल वग़ैरह फ़ोन सेवा तो सुस्त या बिल्कुल बंद हो रही है. नगरपालिका की तरफ़ से घोषणा मिली है कि बिजली भी कई क़रीब शहरों में बंद हो रही है. न्यूज़ में कह रहा है कि तबतक तोक्यो राजधानी क्षेत्र में कम्यूटर ट्रेन की लाइनों पर रोक लगाई जा रहेगी जबतक ट्रेन की पटरियों पर जाँच पूरी न हो, और टीवी पर घर लौटने को इच्छुक यात्रियों की बड़ी भीड़ स्टेशनों पर लगी हुई नज़र आ रही है. ऐसा भी कह रहा है कि यह रोक आज सारी रात के लिए हटेगी नहीं, इस लिए बदले में उपलब्ध किए जाने वाली बस सेवा और टक्सी पर लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं.
शाम ढलते ही अँधेरा छाया और साथ ही काफ़ी ठंड हो रही है. अभी शारीरिक रूप में तो ख़ासा नुक़सान नहीं हुआ, बल्कि मानसिक तौर पर कुछ प्रभाव हो रहा है. बहुत परेशान हो जाते हैं, जैसे बार बार टीवी न्यूज़ में तटीय इलाक़ों में त्सुनामी से मची तबाहियाँ देखकर, और, अब तक न थमने वाले भूकंपोत्तर लहरों को महसूस करके.
इन दसेक सालों में भूकंप की तबाहियों के बारे में अनगिनत ख़बरें देखा करता रहा था, पर पक्के मायने में तो तसव्वुर नहीं कर पाई थी और कहीं लगता था कि अपने ऊपर ऐसा नहीं होगा. अब ऐसा एहसास तो बिल्कुल नहीं रह गया है.
अप्रैल 12, 2010
भित्तिचित्र "आसू-नो शिंवा"
यह विशाल भित्तिचित्र देखके आया.
आंतरिक तोक्यो के एक मुख्य क्षेत्र "शिबुया" में, "केईओ" (एक निजी रेलवे कंपनी) की "ईनोकाशीरा" लाइन और "जेआर" (यानी जापान रेलवे कंपनी, पूर्व-सरकारी कंपनी जो १९८७ से निजीकृत हुई है) लाइन के दोनों स्टेशनों को जोड़ने वाले संपर्क पथ के दीवार पर है यह भित्तिचित्र, और इसकी चौड़ाई ३० मी और ऊँचाई ५.५ मी है.

यह भित्तिचित्र मशहूर जापानी कलाकार "तारो ओकामोतो" द्वारा रचाया गया था, जो २० वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बहुत सक्रिय रहा और जिसका स्वर्गवास १९८६ में हुआ. यह कलाकार अपने अमूर्त शैली के चित्रों से (या कभी इस भित्तिचित्र जैसे बड़े बड़े स्मारकों से भी) पहचाना जाता है, और जापान में काफ़ी व्यापक रूप से प्रसिद्ध रहा है, ख़ासकर जिसका कुछ "विलक्षण" चरित्र की छवि के लिए (मिसाल के तौर पर, उसका एक मशहूर वचन है "कला होती है धमाका!").
यह भित्तिचित्र मूलतः १९६९ में जब बनाया गया था, तब इसको मेक्सिको के एक होटल में स्थापित होना था. लेकिन उसी होटल का निर्माण कुछ वित्तीय समस्या के कारण आधे रास्ते पर ही रद्द किया गया, और इस अव्यवस्था में यह भित्तिचित्र कहीं खो गया. लगभग तीन दशकों के बाद, जभी तक कलाकार तो न रहा, भित्तिचित्र २००३ में फिर मेक्सिको में ढूँढ निकाला गया तो एक गोदाम के अंदर त्यागा हुआ पया गया और टूट के टुकड़े-टुकड़े तक हो गया था.
उसके बाद इस भित्तिचित्र की मरम्मत के लिए कई संस्थानों द्वारा विशेष परियोजना शरू की गई, जिसकी रहनुमाई काम के लिए तोशिको ओकामोतो, जो रचयिता का निजी सचिव और वास्तविक में उसकी जीवन-साथी भी रही थी, ने जद्दोजहद की.
फिर भित्तिचित्र के बहाल होने के बाद इसके स्थापना स्थल को लेकर कई शहर उम्मीदवार के रूप में सामने आए, लेकिन अंततः शिबुया स्टेशन में २००८ से उसी तरह स्थापित किया गया है, जैसे आज वहाँ गुज़रने वाले, कम्यूटर हो या पर्यटक, सबके सामने सार्वजनिक और निरंतर प्रदर्शन हो रहा है.
यहाँ शीर्षक लिखा है "आसू-नो शिंवा (明日の神話)", जिसका मतलब बनता है "आने वाले कल का मिथक".

अब इस भित्तिचित्र पर ऐसा कहा जाता है कि १९५४ में जापानी मछलीमार नौका "दाई-गो हूकू-रियू-मारू" (यानी, शुभ-अजगर पंचम) पर हुई एक विकिरण दुर्घटना के आधार पर बनाया गया.
हादसा इस तरह हुआ कि; जब वह नौका जापान से सुदूर प्रशांत महासागर के मार्शल द्वीपसमूह तक पहुँचकर टूना मछली पकड़ने के लिए अपने काम में जुती रही थी, उसी वक़्त इस द्वीपसमूह के बिकनी एटोल में अमेरिका द्वारा परमाणु परीक्षण किया गया. चाहे वह नौका और उसपर काम कर रहे २३ मछुआरे हों, या तो फिर वहाँ पकड़ी गई मछलियां हों, इनमें से कोइ भी इस परीक्षण के असर से बच न पाए, और इसके मारे वे सरासर विकिरण-दूषित हो गए.
इस दुर्घटना के परिणाम में, जापान में परमाणु हथियार के प्रति विरोधी आवाज़ काफ़ी बुलंद हो उठी (वैसे, एक रोचक बात यह है कि इस जनादोलन का उदय तोक्यो के एक उपनगरी आवासीय क्षेत्र में गृहणी महिलाओं के बीच हुआ था, और फिर वहाँ से देश भर फैला).
कलाकार ने इस भित्तिचित्र पर ऐसा क्षण का चित्रण किया, जब उसी हादसे में उदजन-बम अभी-अभी फट गया हो, और जहाँ परमाणु की सत्यानाशी आग कुछ भयावह काली हवा की दरारों में भड़कते-धड़कते अपने हाथ बढ़ा रही हो.

लेकिन, भित्तिचित्र का यही इतिहास कोई जाने न जाने, अब इसके सामने बहुत-से लोग व्यस्तता के साथ बस गुज़र जाते हैं.
आंतरिक तोक्यो के एक मुख्य क्षेत्र "शिबुया" में, "केईओ" (एक निजी रेलवे कंपनी) की "ईनोकाशीरा" लाइन और "जेआर" (यानी जापान रेलवे कंपनी, पूर्व-सरकारी कंपनी जो १९८७ से निजीकृत हुई है) लाइन के दोनों स्टेशनों को जोड़ने वाले संपर्क पथ के दीवार पर है यह भित्तिचित्र, और इसकी चौड़ाई ३० मी और ऊँचाई ५.५ मी है.
यह भित्तिचित्र मशहूर जापानी कलाकार "तारो ओकामोतो" द्वारा रचाया गया था, जो २० वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बहुत सक्रिय रहा और जिसका स्वर्गवास १९८६ में हुआ. यह कलाकार अपने अमूर्त शैली के चित्रों से (या कभी इस भित्तिचित्र जैसे बड़े बड़े स्मारकों से भी) पहचाना जाता है, और जापान में काफ़ी व्यापक रूप से प्रसिद्ध रहा है, ख़ासकर जिसका कुछ "विलक्षण" चरित्र की छवि के लिए (मिसाल के तौर पर, उसका एक मशहूर वचन है "कला होती है धमाका!").
यह भित्तिचित्र मूलतः १९६९ में जब बनाया गया था, तब इसको मेक्सिको के एक होटल में स्थापित होना था. लेकिन उसी होटल का निर्माण कुछ वित्तीय समस्या के कारण आधे रास्ते पर ही रद्द किया गया, और इस अव्यवस्था में यह भित्तिचित्र कहीं खो गया. लगभग तीन दशकों के बाद, जभी तक कलाकार तो न रहा, भित्तिचित्र २००३ में फिर मेक्सिको में ढूँढ निकाला गया तो एक गोदाम के अंदर त्यागा हुआ पया गया और टूट के टुकड़े-टुकड़े तक हो गया था.
उसके बाद इस भित्तिचित्र की मरम्मत के लिए कई संस्थानों द्वारा विशेष परियोजना शरू की गई, जिसकी रहनुमाई काम के लिए तोशिको ओकामोतो, जो रचयिता का निजी सचिव और वास्तविक में उसकी जीवन-साथी भी रही थी, ने जद्दोजहद की.
फिर भित्तिचित्र के बहाल होने के बाद इसके स्थापना स्थल को लेकर कई शहर उम्मीदवार के रूप में सामने आए, लेकिन अंततः शिबुया स्टेशन में २००८ से उसी तरह स्थापित किया गया है, जैसे आज वहाँ गुज़रने वाले, कम्यूटर हो या पर्यटक, सबके सामने सार्वजनिक और निरंतर प्रदर्शन हो रहा है.
यहाँ शीर्षक लिखा है "आसू-नो शिंवा (明日の神話)", जिसका मतलब बनता है "आने वाले कल का मिथक".
अब इस भित्तिचित्र पर ऐसा कहा जाता है कि १९५४ में जापानी मछलीमार नौका "दाई-गो हूकू-रियू-मारू" (यानी, शुभ-अजगर पंचम) पर हुई एक विकिरण दुर्घटना के आधार पर बनाया गया.
हादसा इस तरह हुआ कि; जब वह नौका जापान से सुदूर प्रशांत महासागर के मार्शल द्वीपसमूह तक पहुँचकर टूना मछली पकड़ने के लिए अपने काम में जुती रही थी, उसी वक़्त इस द्वीपसमूह के बिकनी एटोल में अमेरिका द्वारा परमाणु परीक्षण किया गया. चाहे वह नौका और उसपर काम कर रहे २३ मछुआरे हों, या तो फिर वहाँ पकड़ी गई मछलियां हों, इनमें से कोइ भी इस परीक्षण के असर से बच न पाए, और इसके मारे वे सरासर विकिरण-दूषित हो गए.
इस दुर्घटना के परिणाम में, जापान में परमाणु हथियार के प्रति विरोधी आवाज़ काफ़ी बुलंद हो उठी (वैसे, एक रोचक बात यह है कि इस जनादोलन का उदय तोक्यो के एक उपनगरी आवासीय क्षेत्र में गृहणी महिलाओं के बीच हुआ था, और फिर वहाँ से देश भर फैला).
कलाकार ने इस भित्तिचित्र पर ऐसा क्षण का चित्रण किया, जब उसी हादसे में उदजन-बम अभी-अभी फट गया हो, और जहाँ परमाणु की सत्यानाशी आग कुछ भयावह काली हवा की दरारों में भड़कते-धड़कते अपने हाथ बढ़ा रही हो.
लेकिन, भित्तिचित्र का यही इतिहास कोई जाने न जाने, अब इसके सामने बहुत-से लोग व्यस्तता के साथ बस गुज़र जाते हैं.
मार्च 21, 2010
वसंत का नज़ारा
तोक्यो में अब वसंत का ताज़ा रंग दिन ब दिन गहरा आ रहा है. सौभाग्य से आज मौसम बहुत अच्छा रहा था और हवा भी काफ़ी नरम रही थी. सो मैं भी ऐसे वातावरण में कुछ उकसाया गया, और फिर यों ही साइकिल पे थोड़ी-सी सैर पर निकला.
**
नहर के किनारे घने खिले फूल, जो वसंत का ख़ूब रंग जमा रहे हैं.
गली के किनारे पड़ा एक पत्थर, जिसकी इबादत के लिए छोटा "तोरिई" द्वार बना रखा है.
**
फिर चलते-चलते, अब आ गया समुंद्र तट और राष्ट्रीय मार्ग न॰ १ पर. और बायें दूर कोने में दिखाई दे रहा है, "एनोशीमा" लघु द्वीप.
इस दो पहर के समय आसमान में काफ़ी धूल उड़ रही थी, जिसका धुंधलापन शायद नीचे वाले फ़ोटो (चार बजे का वही साहिल) से तुलना करके देखें तो पाया जा सकेगा. मौसम एजेंसी के अनुसार, यह धूल सुदूर चीन-मंगोलिया के रेगिस्तान से वायु में उड़ आई पीली रेत की वजह से मची.
राष्ट्रीय मार्ग और इसके साथ-साथ चलने वाले नैरो गेज रेलवे के पीछे धूप में उभर आती है, द्वीप की रूपरेखा.
**
चलते-चलते अब "कामाकुरा" शहर पहुँच गया, जो तोक्यो के निकट (लगभग ५० किमी दूर) एक पुराचीन नगर है, और जहाँ १२ वीं सदी के अंत से १४ वीं सदी के माध्यम तक एक शोगुनेट (सल्तनत सत्ता) की राजधानी रही थी.
शहर के केंद्र में स्थित यह माननीय शिंतो मंदिर है, "त्सूरूगाओका हाचीमान-गू".
इसके मैदान में पारंपरिक ढंग से निर्मित एक सुंदर मंच भी है, जहाँ काफ़ी भीड़ लग रही थी.
पास आया तो पता चल गया कि वहाँ विवाह समारोह हो रहा था. विवाह स्थल के बराबर, या उससे भी ज़्यादा, बहुत शानदार और अनोखा समारोह था, जो शिंतो शैली में और मध्ययुगीन अभिजातों के सदृश मनाया जा रहा था.
ख़ास तौर दुल्हन क्लासिक पोशाक "जूनी-हितोए" में ख़ूब सजी नज़र आ रही थी. यह परिधान परत-दर-परत पहनाए जाने वाले अलग-अलग रंग के कपडों से बनती है और मूलतः शाही महल की महिलाओं को ही पहनने की अनुमति दी जाती थी.
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मंदिर के आसपास छोटी गली के किनारे पाया गया है एक चेरी का पेड़.
शाखाओं पर कई ही कलियाँ शीघ्र खिल गई थीं, ताहम बाक़ी कलियाँ सही वक़्त आने तक कुछ और देर का इंतज़ार में सो रही थीं.

वृक्ष के तना-शाखा भी बहुत सुरूप बने हुए हैं, जैसे वृक्ष बयान करता हो यहाँ बसा हुआ अपना लंबा अरसा.
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नज़दीकी में वाक़े है, "केंचो-जी".

यह ज़ेन बौद्ध धर्म के "रीनज़ाई" पंथ का प्राचीन और मानवीय मंदिर है जिसका निर्माण १३ वीं शताब्दी में हुआ. अब जापान में सबसे पुराने ज़ेन बौद्ध मठ कहा जाता है.
वहाँ शांत बग़ीचा भी है जहाँ अच्छी तरह देखभाल कर रखी है और तरह तरह के फूलों से सजा भी होता है मगर कुछ अप्रत्यक्ष और ललित अंदाज़ में.



यहाँ की चेरी की भी चंद कलियाँ अभी-अभी तो खिलने वाली थीं.
पता नहीं क्यों उत्सकुता ऐसे दौरान बेहद बढ़ जाती है जब चेरी की कलियाँ आज खिले या न खिले, इसी उम्मीद से कहीं दिल भरपूर होते हुए दिन गुज़रा जाता है.
और यही उत्सुकता शायद उस वक़्त से भी ज़्यादा चढ़ती है, जब हर जगह पूरी तरह से फूल खिल गए हैं.
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फिर चलते-चलते, अब आ गया समुंद्र तट और राष्ट्रीय मार्ग न॰ १ पर. और बायें दूर कोने में दिखाई दे रहा है, "एनोशीमा" लघु द्वीप.
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चलते-चलते अब "कामाकुरा" शहर पहुँच गया, जो तोक्यो के निकट (लगभग ५० किमी दूर) एक पुराचीन नगर है, और जहाँ १२ वीं सदी के अंत से १४ वीं सदी के माध्यम तक एक शोगुनेट (सल्तनत सत्ता) की राजधानी रही थी.
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मंदिर के आसपास छोटी गली के किनारे पाया गया है एक चेरी का पेड़.
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नज़दीकी में वाक़े है, "केंचो-जी".
यहाँ की चेरी की भी चंद कलियाँ अभी-अभी तो खिलने वाली थीं.
मार्च 19, 2010
पॉश "कैफ़े राष्ट्र" का अत्याचार?
आप कहाँ कॉफ़ी पीना पसंद करते हैं? मैं घर पे तो अक्सर चाय ही पीता हूँ. मगर जब भी कुछ किताबें एकाग्रता से पढ़ने के लिए कहीं बाहर कॉफ़ी शॉप जाता हूँ तो, कॉफ़ी का इच्छुक हो जाता हूँ (न जाने क्यों, शायद दुकान के अंदर जो खुशबू समाई होती है, इस लिए?).
जैसे अब भारत के हर महानगर के केंद्र में "बरिस्ता" या "कैफ़े कॉफ़ी डे" की शाख़ा कहीं न कहीं एक तो ज़रूर देखने को मिलती है, ऐसी ही कैफ़े बूम जापान में भी इस एक-डेढ़ दशक से ता होती रही है. मेट्रो इलाक़ों में बड़े स्टेशनों के इर्द-गिर्द या उपनगरी शौपिंग कॉम्प्लेक्सों के अंदर तो क्या, अब नगरपालिका ऑफिस, या सरकारी अस्पताल और कॉलेज जैसी सार्वजनिक या अध-सार्वजनिक संस्थाओं की कैंटीनें भी प्राशासनिक-लागत-कटाओ वाले रुझान पर निजीकृत होकर कैफ़े श्रृंखलाओं की शाख़ाओं में तब्दील हो जा रही हैं. और बदलाव कॉफ़ी शॉप की तादाद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसका अंदाज़ भी थोड़ा-बहुत बदल चुका है. "स्टारबक्स" आदि अंतरराष्ट्रीय कॉफ़ी शॉप श्रृंखलाओं की बहुत सी स्थानीय दुकानें खुल गई हैं, और देशी कंपनियों की कॉफ़ी शॉप श्रृंखलाओं ने भी वही "सियाटल शैली कैफ़े" फॉर्मेट को अपना लिया है.
कॉफ़ी शॉपों में आए इस सर्वत्र "कैफ़ेकरण" का एक अतिरिक्त प्रभाव होता है. वह है इटली अलफ़ाज़, जिसका इस्तेमाल आजकल हर सियाटल शैली कैफ़े के मेनू में बहुत ज़्यादा हो रहा है. इसी अलबेला-किंतु-अनावश्यक "कैफ़े बोली" के चक्कर में मैं कुछ फस रहा था.
मसला तो "कैफ़े-लट्टे" का था. इस प्रकार की कॉफ़ी मेनू में आम तौर पर "सादा कॉफ़ी" और "कैपेचीनो" के दरमियान आती है और दाम-ज़ायक़े की नज़रिए से मुनासिब विकल्प लगती है, इस लिए मैं अक्सर यही मँगाता हूँ. लेकिन, पता नहीं कितनी बार भी ऑर्डर करने के बावजूद, कभी कभी ऑर्डर के वक़्त ग़लत बोला जाता है "कैफ़े-ऑ-ले, प्लीज़". उस फ्रेंच मूल की दूध मिश्रित कॉफ़ी का नाम जापानी भाषा में, और कॉफ़ी शॉप मेनू की शब्दावली में (कम से कम कैफ़े-लट्टे के मुक़ाबले) काफ़ी अरसे से आम लफ़्ज़ होता रहा है, और बोलने में भी मुझे कहीं आसान लगता है.
ज़्यादातर कैफ़े वाले भाई-दीदियाँ तो उनकी कार्यवश कृपालुता से मेरे ग़लत कैफ़े-ऑ-ले ऑर्डर को नज़रंदाज़ कर ठीक से कैफ़े-लट्टे का ऑर्डर प्राप्त कर लेते हैं. लेकिन कभी (बहुत कम ही तो है, फिर भी कई बार) कुछ अनाड़ी या विरोधी अंदाज़ में कैफ़े वालों की ऐसी प्रतिक्रयाएँ भी मिल जाती हैं, जैसी कि "सॉरी सर, हमारे मेनू में कैफ़े-ऑ-ले नहीं होता, मगर कैफ़े-लट्टे तो है. ठीक है?"
कैफ़े-लट्टे या -ऑ ले, ये दोनों का मूल शब्दार्थ एक जैसा ही मैं समझ रखा था, यानी "कॉफ़ी और/के साथ दूध". इससे आगे दोनों प्रकार की कॉफ़ियों के बीच, आख़िर क्या फ़र्क़ पड़ता है? मैंने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया था. और इसी अनजानी में ऊपर जैसे कैफ़े वालों के जवाब से कहीं चिढ़ भी महसूस हो जाती थी.
लेकिन हाल ही में एक दोस्त ने बताया कि कैफ़े-लट्टे के लिए विशेष यंत्र द्वारा ब्रूड की जाने वाली बहुत गाढ़ी एस्प्रेसो कॉफ़ी और स्टीम्ड दूध का इस्तेमाल होता है, जहाँ कैफ़े-ऑ-ले के लिए ड्रिप्ड कॉफ़ी और सादा गर्म दूध का इस्तेमाल होता है. आख़िर कैफ़े-ऑ-ले और -लट्टे दोनों का बड़ा अंतर तो मेरे समझ में आ गया है ही.
...फिर भी कुछ सवाल रह जाता तो है कि "जिस कैफ़े के मेनू में कैफ़े-लट्टे ही है, वहीं कैफ़े-ऑ-ले का ऑर्डर ग़लती से देना इतना बड़ा पाप है?"
जनवरी 08, 2009
आकेमाशीते बधाई 2009
आप सबको "आकेमाशीते ओमेदेतो गोज़ाइमास", मेरी हार्दिक शुभ्कामनाएँ, चाहे आप नए पॉस्ट का बेसब्र इंतज़ार करते हों, या जभी यहाँ आया करते हों कि आर एस एस फ़ीड मिलती है, या फिर सर्च एंजिन पे कुछ खोजते खोजते यों ही पहुँच गए हों. देखते रहें, इस साल भी शायद कभी-कभार लेकिन ज़रूर लिखता रहूँगा, जापान के एक कोने से...
वैसे तो, चीनी कैलेंडर के अनुसार यह साल "बैल-गाय" का होता है, इस लिए मेरा न्यू यियर कार्ड भी नंदी की एक लोक चित्र पर बनाया है.
वैसे तो, चीनी कैलेंडर के अनुसार यह साल "बैल-गाय" का होता है, इस लिए मेरा न्यू यियर कार्ड भी नंदी की एक लोक चित्र पर बनाया है.
जनवरी 01, 2008
नए साल के अवसर पर...
नए साल के अवसर पर क्षण भर के लिए वापसी!!

क्यों मेंढक? यह साल जापान में होता है मेंढक का?
ग़लत! असल में तो चीनी कैलेंडर के हिसाब से "चूहे" का होता है. (कोई ख़ासा मायने नहीं, सिवाय जिस मिट्टी के मेंढक को कभी भोपाल में देखा, इसका परिचय आप लोगों से कराने का. इसका अजब-सा आकर्षण, आप समझ सकते हैं न?)
शायद सालाना ब्लॉग होने लगा? पता नहीं अगली पोस्ट कब होगी, मगर क्भी कभार तो ज़रूर लिखता जाऊँगा. (और मेरी ग़ैर-मौजूदगी के दौरान कई कॉमेंट आए थे, अभी तक उनका जवाब दिए बिना ही छोड़के रखने के लिए क्षमा करें.)
नववर्ष की ओमेदेतो!!
इस साल भी योरोशीकु ओनेगाइ मोशीआगेमासु
(मतलब तो पड़ोस में रहने वाले किसी जापानी दोस्त से पूछ लीजिए.)

क्यों मेंढक? यह साल जापान में होता है मेंढक का?
ग़लत! असल में तो चीनी कैलेंडर के हिसाब से "चूहे" का होता है. (कोई ख़ासा मायने नहीं, सिवाय जिस मिट्टी के मेंढक को कभी भोपाल में देखा, इसका परिचय आप लोगों से कराने का. इसका अजब-सा आकर्षण, आप समझ सकते हैं न?)
शायद सालाना ब्लॉग होने लगा? पता नहीं अगली पोस्ट कब होगी, मगर क्भी कभार तो ज़रूर लिखता जाऊँगा. (और मेरी ग़ैर-मौजूदगी के दौरान कई कॉमेंट आए थे, अभी तक उनका जवाब दिए बिना ही छोड़के रखने के लिए क्षमा करें.)
नववर्ष की ओमेदेतो!!
इस साल भी योरोशीकु ओनेगाइ मोशीआगेमासु
(मतलब तो पड़ोस में रहने वाले किसी जापानी दोस्त से पूछ लीजिए.)
जनवरी 03, 2007
नए साल के आग़ाज़ में...
इस बार भी नववर्ष की शुभकामनाएँ के साथ देता हूँ,
सभी को "あけまして おめでとう" (आकेमाशीते ओमेदेतो)
कैसा होगा यह साल और क्या क्या होने वाला है इस साल में, यह तो फ़िलहाल अंदाज़ा भी नहीं, पर उम्मीद है कि गुज़रे साल की तरह अच्छा ही रहेगा.
वैसे, आपको पता है ? सुना है कि सन् 2007 "जापान-भारत मैत्री वर्ष" भी है. इस सिलसिले, दोनों देशों के अनेक जगहों में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि भी बहुत आयोजित किए जाएँगे. अगर ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने का मौक़ा मिल जाए तो कभी यहाँ लिखूँगा.

बाइ द वे, पिछ्ले साल के अंत में एक छोटा मोटा काम किया, जिसमें एक विशेष डॉक्युमेंटरी प्रोग्राम के लिए हिंदी वग़ैरह का अनुवाद करने का था. नहीं नहीं, ऍग्ज़ैक्ट्ली बोले तो अनुवाद करने में मदद करने का था, मेरा काम तो. मतलब एक भारतीय पेशेवर अनुवादक के साथ बैठे वीडियो टेप देखना, उनके जापानी में अनुवाद कर कहे को टाइपिंग करते जाना, और कहीं बारीक ढंग से अनुवाद करने के लिए सहज जापानी भाषी के रूप में थोड़ी-सी सलाह देना.
मैंने ख़ुद इतना बड़ा काम तो किया ही नहीं, फिर भी करते करते ख़ूब मज़ा आया और अपने लिए बहुत अच्छा अनुभव भी रहा.
वह अनुवादक साहब मूलतः मराठी हैं, फिर भी पक्के मुंबईकर होने के नाते गुजराती भाषा भी थोड़ा-बहुत समझ लेते हैं. और वीडियो-टेप के ज़्यादा हिस्से गुजरात के शहर में शूट किए गए हैं, इस लिए इंडियन-इंग्लिश, हिंदी, मराठी के अलावा गुजराती भी हमारे काम में शामिल हुई.
सो, गुजराती में बहुत बातें सुनते सुनते, और अनुवादक साहब से कुछ पाठ लेने के बाद, लगता है कि मुझे थोड़ी-सी गुजराती भी आ गई.
ज़रा सुनिए तो गुजराती भाषी भाइयो,
" એ કામ મને વધારે સારું લાગ્યું છે !! " (सही ?)
सभी को "あけまして おめでとう" (आकेमाशीते ओमेदेतो)
कैसा होगा यह साल और क्या क्या होने वाला है इस साल में, यह तो फ़िलहाल अंदाज़ा भी नहीं, पर उम्मीद है कि गुज़रे साल की तरह अच्छा ही रहेगा.
वैसे, आपको पता है ? सुना है कि सन् 2007 "जापान-भारत मैत्री वर्ष" भी है. इस सिलसिले, दोनों देशों के अनेक जगहों में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि भी बहुत आयोजित किए जाएँगे. अगर ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने का मौक़ा मिल जाए तो कभी यहाँ लिखूँगा.

बाइ द वे, पिछ्ले साल के अंत में एक छोटा मोटा काम किया, जिसमें एक विशेष डॉक्युमेंटरी प्रोग्राम के लिए हिंदी वग़ैरह का अनुवाद करने का था. नहीं नहीं, ऍग्ज़ैक्ट्ली बोले तो अनुवाद करने में मदद करने का था, मेरा काम तो. मतलब एक भारतीय पेशेवर अनुवादक के साथ बैठे वीडियो टेप देखना, उनके जापानी में अनुवाद कर कहे को टाइपिंग करते जाना, और कहीं बारीक ढंग से अनुवाद करने के लिए सहज जापानी भाषी के रूप में थोड़ी-सी सलाह देना.
मैंने ख़ुद इतना बड़ा काम तो किया ही नहीं, फिर भी करते करते ख़ूब मज़ा आया और अपने लिए बहुत अच्छा अनुभव भी रहा.
वह अनुवादक साहब मूलतः मराठी हैं, फिर भी पक्के मुंबईकर होने के नाते गुजराती भाषा भी थोड़ा-बहुत समझ लेते हैं. और वीडियो-टेप के ज़्यादा हिस्से गुजरात के शहर में शूट किए गए हैं, इस लिए इंडियन-इंग्लिश, हिंदी, मराठी के अलावा गुजराती भी हमारे काम में शामिल हुई.
सो, गुजराती में बहुत बातें सुनते सुनते, और अनुवादक साहब से कुछ पाठ लेने के बाद, लगता है कि मुझे थोड़ी-सी गुजराती भी आ गई.
ज़रा सुनिए तो गुजराती भाषी भाइयो,
" એ કામ મને વધારે સારું લાગ્યું છે !! " (सही ?)
नवंबर 02, 2006
बोले तो "नमस्ते इंडिया"...
लगभग डेढ़ महीने पहले की बात है, जब यहाँ तोक्यो में ऐसा दो दिवसीय उत्सव हो रहा था.
उस दिन वहाँ खुले बाज़ार की तरह चादरों के नीचे बहुत-सी दुकानें इकट्ठे लगाई गई थीं, और उनके बीच-बीच के रास्ते तो इनसानों की भीड़ से घने हुए थे. खान-पान, पहनावे-ज़ेवरात और बॉलीवुड, ये सब चीज़ें यतायात लोगों को लुभाकर अपना ग्राहक बना लेती थीं. दूसरी तरफ़ एक कोने में तरह तरह के संगीत-नृत्य का प्रदर्शन भी हो रहा था, और मंच के सामने जमे हुए लोग ख़ूब मज़ा लेते थे.
हम भी घूम रहे थे जलेबी और समोसे का मज़ा लेते हुए, तो दूर से देखा कि भीड़ में एक इंडियन न्यूज़ चैनल वाला माइक लेकर अपने क्रू के साथ खड़ा हुआ था और कैमरा के सामने कुछ रिपोर्टिंग चल रहा था.
तभी तो एक नज़र डालके ही हम आगे चले गए, और उसकी कोई ख़ास याद नहीं रही थी. फिर आज पता चला कि उस रिपोर्टिंग का नतीजा यहाँ देख सकते हैं. शायद आपको ज़रा अहसास दिलाएगा उस दिन के मौज़-मस्ती भरे माहौल का...
उस दिन वहाँ खुले बाज़ार की तरह चादरों के नीचे बहुत-सी दुकानें इकट्ठे लगाई गई थीं, और उनके बीच-बीच के रास्ते तो इनसानों की भीड़ से घने हुए थे. खान-पान, पहनावे-ज़ेवरात और बॉलीवुड, ये सब चीज़ें यतायात लोगों को लुभाकर अपना ग्राहक बना लेती थीं. दूसरी तरफ़ एक कोने में तरह तरह के संगीत-नृत्य का प्रदर्शन भी हो रहा था, और मंच के सामने जमे हुए लोग ख़ूब मज़ा लेते थे.
हम भी घूम रहे थे जलेबी और समोसे का मज़ा लेते हुए, तो दूर से देखा कि भीड़ में एक इंडियन न्यूज़ चैनल वाला माइक लेकर अपने क्रू के साथ खड़ा हुआ था और कैमरा के सामने कुछ रिपोर्टिंग चल रहा था.
तभी तो एक नज़र डालके ही हम आगे चले गए, और उसकी कोई ख़ास याद नहीं रही थी. फिर आज पता चला कि उस रिपोर्टिंग का नतीजा यहाँ देख सकते हैं. शायद आपको ज़रा अहसास दिलाएगा उस दिन के मौज़-मस्ती भरे माहौल का...
जनवरी 09, 2006
नववर्ष की चट्ठी...

नए साल की शुरूआत में बधाई देने के लिए,
मेरी तरफ़ से सबको
"あけまして おめでとう"
(आकेमाशीते ओमेदेतो)
(आकेमाशीते ओमेदेतो)
बाईं से दाईं तरफ़, देवनागरी की नक़ली लिपि में ऐसा लिखे है.
और ऊपर से नीचे "謹賀新年" (किन्-गा-शिन्-नेन्) लिखे है, जो "आकेमाशीते..." का लिखित भाषा वाला शब्द है.
शायद अभी थोड़ी देर हो गई होगी...
लेकिन, अगर कोई जापानी लोग आपके साथ काम करते हों या पड़ोस में रहते हों, और आप उनसे ज़रा बात करने के लिए कुछ बहाना चाहते हों, तो आपको इस मौक़े का फ़ायदा उठाना होगा ज़रूर.
कहिएगा उनसे, "आकेमाशीते ओमेदेतो !! "
इसके बाद "-गोज़ाइमासु"(ございます) लगाएँ तो और इज़्ज़त के साथ सुनाई देंगे.
जापान में नियमित तौर पर इस मौक़े पर ऐसी चिट्ठी "年賀状"(नेंगाजो) लिखते (या आजकल PC पे बना लेते) हैं. फिर उसे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, ऑफ़िस के कॉवर्करों-बॉसों, बिजनेस पार्टनरों-कस्टमरों, जो भी रोज़ मिलते हों या लंबे समय से न देखे हों, ऐसे लोगों की तरफ़ भेज देते हैं.
मेरी तरफ़ से और कुछ...टाइमपास !
लीजिए, सन् 2006 के लिए ऐसे बहुत नंबर युनिकोड में होते हैं.
ज़रा देखें कितने तक पहचान पाएँगे ??
*जवाब; हर नंबर के किनारे पे, सफ़ेद रंग में.
२००६ Hindi हिंदी
২০০৬ Bangla बंग्ला
੨੦੦੬ Punjabi पंजाबी
૨૦૦૬ Gujarati गुजराती
୨୦୦୬ Oriya उड़िया
౨౦౦౬ Telugu तेलुगु
೨೦೦೬ Kannada कन्नड
൨൦൦൬ Malayalam मलयालम
௨00௬ Tamil तमिल
๒๐๐๖ Thai थाई
໒໐໐໖ Lao लाओ
༢༠༠༦ Tibetan तिब्बती
۲۰۰۶ Arabic-Indic (Eastern:Farsi&Urdu)
दिसंबर 07, 2005
आवरण कथा : भारत
पिछले महीने न्यूज़वीक जापान-संस्करण के इस तरह के कवर थे...
यानी, लगातार दो अंकों में कवर स्टोरी के लिए भारत को चुन लिया गया.
पहला अंक है जिसमें भारत को देखते हैं उसकी व्यापारिक सक्षमता के नज़रिए से, दूसरा है राजनैतिक सक्षमता के नज़रिए से. और कवर पर "インド" (भारत) के नीचे ऐसे लिखे हैं,
दरअसल इन कई सालों से आम जापानी लोगों के बीच भारत की छवि थोड़ी-बहुत बदल चुकी है...
प्राचीन युग से तो बौद्ध धर्म का सुदूर देश था भारत. फिर आधुनिक युग की शुरूआत से द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत तक, इतिहास की हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी तरह दोनों मुल्कों को क़रीब ले आईं थीं, जब रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) और सुभाष चंद्र बोस यहाँ आए, मेरी यूनिवर्सिटी के हिंदी-उर्दू विभागों (जो पहले एक ही हिंदुस्तानी विभाग थे) की स्थापना भी हुई. युद्ध के बाद भी एक न्यायाधीश, राधा बिनोद पाल थे, जिन्होंने तोक्यो युद्ध-अपराध न्यायाधिकरण में अकेले ऐसा अनुरोध किया कि तब तक जापान निर्दोष ही है जब तक न्याय की समानता के अनुसार जय पाने वाले देशों को भी अपने युद्ध-अपराध का दोष न लगाया जाए.
शीतयुद्ध के दौरान जापानी सरकार के विदेश-नीति के नक़्शे में भारत थोड़ा दूर हो गया था, जहाँ सत्थर के दशक में जापानी नागरिकों के लिए विदेश-यात्रा आज़ाद होने के बाद भारत ऐसी यात्रियों की बड़ी मंज़िल होने लगा. फिर भी आम लोगों के बीच भारत की छवि जैसी की तैसी रही थी.
नब्बे के दशक से दुनिया में भूमंडलीकरण का असर काफ़ी साफ़ नज़र आने लगा और आज की इस मशहूर कहानी कहीं भी सुनाई देने लगी है कि भारत और चीन, तीन अरब लोगों के, यानी दुनिया की एक-थिहाई आबादी वाले देश ही बनेंगे आगे इक्कीसवीं शताब्दी में सुपर-पॉवर. सो ऐसी सिलसिले में यह पत्रिका भी ऐसी तरह निकली है.
माहौल केवल 5-6 साल पहले भी ऐसा था कि तब भारत के नाम को आई टी से जुड़ाने वाले लोग बहुत कम ही होते थे और भारतीयों को रोज़ देखने का मौक़ा भी ज़्यादा नहीं था सिवाय भारतीय रेस्ट्राँ के. सन् 2000 में पूर्व जापानी प्रधानमंत्री योशिरो मोरी (森 喜朗) भारत आए, जिसके बाद दोनों देशों के बीच एक वीज़ा-समझौता किया गया. अब भारतीय आई टी इंजीनियरों को तीन साल तक लागू मल्टिप्ल-व्यापारी-वीज़ा मिल सकता है, और फ़िलहाल लगभग 14000 (दस साल पहले 4000) भारतीय नागरिक जापान में रहते हैं जिनमें 3000 ऐसे इंजीनियर हैं. अब भारत के साथ करी के देश वाला पूर्वाग्रह भी बदल रहा है.
दूसरी तरफ़ जापान में काम करने वाले भारतीय इंजीनियोरों और उनके परिवारों के लिए कई तरह की सुविधाएँ भी तैयार हो रही हैं.
जापान में रहने के लिए भाषा एक समस्य तो होती है क्योंकि यहाँ अंग्रेजी में ही ख़रीदारी जैसा कुछ रोज़ाना काम करना उतना आसान नहीं है जितनी आसानी से अमरीका या अन्य पश्चिम देशों में ऐसा काम हो जाएगा. फिर भी पहले आए भारतीय पड़ोसियों से सामूहिक सहारा ले सकें तो कोई लफड़ा-वफड़ा नहीं होगा. और पहले से बड़े शहरों में कहीं न कहीं पाकिस्तानी या बंगलदेशी मालिकों की हलाल-दुकानें होती हैं, जहाँ मिलते हैं मुसलमानों के हलाल-गोश्त के अलावा मसाले-दाल जैसे बुनियादी खाद्य उत्पादन, कपड़े, फ़िल्म की कॉपी वीडियो, साबुन-शैंपू जैसे कॉस्मेटिक्स, वग़ैरह हर ज़रूरतों के पदार्थ. अब ऐसी चीज़ें इंटर्नेट पर भी इधर उधर ख़रीद सकते हैं बिना घर से बाहर और दूर तक जाके.
बच्चों की पढ़ाई के लिए तो पिछले साल तोक्यो में एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्कूल शुरू हुआ है, जो स्थानी पब्लिक-स्कूल (जापानी मीडियम, फ़ीज़ मुफ़्त) और निजी इंटर्नेशनल-स्कूल (अंग्रेज़ी-मीडियम, फ़ीज़ हाइ) के अलावा माता-पिताओं के लिए अच्छा विकल्प बन सकता है.
ऐसे भी लिखा है, आज से कई सालों में जापान में रहने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या और बढ़ सकती है. तो आगे मेरी हिंदी भी कुछ काम तो आएगी, या...??
यानी, लगातार दो अंकों में कवर स्टोरी के लिए भारत को चुन लिया गया.पहला अंक है जिसमें भारत को देखते हैं उसकी व्यापारिक सक्षमता के नज़रिए से, दूसरा है राजनैतिक सक्षमता के नज़रिए से. और कवर पर "インド" (भारत) के नीचे ऐसे लिखे हैं,
" 動き出す巨象経済 "
(चलने लगा है महा-हाथी अर्थव्यवस्था)
" 超大国の誇りと野望 "
(सुपर-पॉवर का गर्व और आकांक्षा)

दरअसल इन कई सालों से आम जापानी लोगों के बीच भारत की छवि थोड़ी-बहुत बदल चुकी है...
प्राचीन युग से तो बौद्ध धर्म का सुदूर देश था भारत. फिर आधुनिक युग की शुरूआत से द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत तक, इतिहास की हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी तरह दोनों मुल्कों को क़रीब ले आईं थीं, जब रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) और सुभाष चंद्र बोस यहाँ आए, मेरी यूनिवर्सिटी के हिंदी-उर्दू विभागों (जो पहले एक ही हिंदुस्तानी विभाग थे) की स्थापना भी हुई. युद्ध के बाद भी एक न्यायाधीश, राधा बिनोद पाल थे, जिन्होंने तोक्यो युद्ध-अपराध न्यायाधिकरण में अकेले ऐसा अनुरोध किया कि तब तक जापान निर्दोष ही है जब तक न्याय की समानता के अनुसार जय पाने वाले देशों को भी अपने युद्ध-अपराध का दोष न लगाया जाए.
शीतयुद्ध के दौरान जापानी सरकार के विदेश-नीति के नक़्शे में भारत थोड़ा दूर हो गया था, जहाँ सत्थर के दशक में जापानी नागरिकों के लिए विदेश-यात्रा आज़ाद होने के बाद भारत ऐसी यात्रियों की बड़ी मंज़िल होने लगा. फिर भी आम लोगों के बीच भारत की छवि जैसी की तैसी रही थी.
नब्बे के दशक से दुनिया में भूमंडलीकरण का असर काफ़ी साफ़ नज़र आने लगा और आज की इस मशहूर कहानी कहीं भी सुनाई देने लगी है कि भारत और चीन, तीन अरब लोगों के, यानी दुनिया की एक-थिहाई आबादी वाले देश ही बनेंगे आगे इक्कीसवीं शताब्दी में सुपर-पॉवर. सो ऐसी सिलसिले में यह पत्रिका भी ऐसी तरह निकली है.
माहौल केवल 5-6 साल पहले भी ऐसा था कि तब भारत के नाम को आई टी से जुड़ाने वाले लोग बहुत कम ही होते थे और भारतीयों को रोज़ देखने का मौक़ा भी ज़्यादा नहीं था सिवाय भारतीय रेस्ट्राँ के. सन् 2000 में पूर्व जापानी प्रधानमंत्री योशिरो मोरी (森 喜朗) भारत आए, जिसके बाद दोनों देशों के बीच एक वीज़ा-समझौता किया गया. अब भारतीय आई टी इंजीनियरों को तीन साल तक लागू मल्टिप्ल-व्यापारी-वीज़ा मिल सकता है, और फ़िलहाल लगभग 14000 (दस साल पहले 4000) भारतीय नागरिक जापान में रहते हैं जिनमें 3000 ऐसे इंजीनियर हैं. अब भारत के साथ करी के देश वाला पूर्वाग्रह भी बदल रहा है.
दूसरी तरफ़ जापान में काम करने वाले भारतीय इंजीनियोरों और उनके परिवारों के लिए कई तरह की सुविधाएँ भी तैयार हो रही हैं.
जापान में रहने के लिए भाषा एक समस्य तो होती है क्योंकि यहाँ अंग्रेजी में ही ख़रीदारी जैसा कुछ रोज़ाना काम करना उतना आसान नहीं है जितनी आसानी से अमरीका या अन्य पश्चिम देशों में ऐसा काम हो जाएगा. फिर भी पहले आए भारतीय पड़ोसियों से सामूहिक सहारा ले सकें तो कोई लफड़ा-वफड़ा नहीं होगा. और पहले से बड़े शहरों में कहीं न कहीं पाकिस्तानी या बंगलदेशी मालिकों की हलाल-दुकानें होती हैं, जहाँ मिलते हैं मुसलमानों के हलाल-गोश्त के अलावा मसाले-दाल जैसे बुनियादी खाद्य उत्पादन, कपड़े, फ़िल्म की कॉपी वीडियो, साबुन-शैंपू जैसे कॉस्मेटिक्स, वग़ैरह हर ज़रूरतों के पदार्थ. अब ऐसी चीज़ें इंटर्नेट पर भी इधर उधर ख़रीद सकते हैं बिना घर से बाहर और दूर तक जाके.
बच्चों की पढ़ाई के लिए तो पिछले साल तोक्यो में एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्कूल शुरू हुआ है, जो स्थानी पब्लिक-स्कूल (जापानी मीडियम, फ़ीज़ मुफ़्त) और निजी इंटर्नेशनल-स्कूल (अंग्रेज़ी-मीडियम, फ़ीज़ हाइ) के अलावा माता-पिताओं के लिए अच्छा विकल्प बन सकता है.
ऐसे भी लिखा है, आज से कई सालों में जापान में रहने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या और बढ़ सकती है. तो आगे मेरी हिंदी भी कुछ काम तो आएगी, या...??
सितंबर 09, 2005
ऑटरिक्श पे भी शेर...
मार्च 23, 2005
ठंडी मतलब....चाय !!
आजकल जापान में भी वही चाय एकदम प्रसिद्ध और लोकप्रिय होती जा रही है, जो दूध-मसाले वाली इंडिया स्टाइल की है. इसी समय वह हाल इतना तक आ गई कि एक मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पिछले महीने से अपने उत्पादनों में इंडिया-चाय शामिल किया है.
फिर भी वह तो गरम गरम तो नहीं....ठंडी ठंडी चाय ही....
.....यानी चाय फ़्लेवर आइस्क्रीम..... (120ml/250¥)
गत माह से टी.वी. पर विज्ञापन लगाया गया है, बार बार जो देखके मुझे अजीब सा लगा. सितार व तबला बजते हैं, न जाने क्यों साड़ी पहने हुई गोरी महिला पद्मासन में बैठी है, उसकी आँखें बंद हुई हैं और फिर हाथ में चाय आइसक्रीम लिए आराम करती है.
मशहूर आइस्क्रीम कंपनी "Häagen-Dazs" का ब्रांड यहाँ ऐसा माना जाता है कि दाम महँगा तो पड़ता है लेकिन वही मज़ा किसी दूसरों में कहीं नहीं मिलता. सोचा था कि यह वाला फ़्लेवर भी शायद अच्छा तो होगा मगर....कैसा...!?
आज ख़रीद लेके एक चम्मच चख लिया तो... वाह, ज़बान पर इलायची और दारचीनी की ख़ुशबू हलकी हलकी आती है. ठीक ठाक तो होगा, ठंडी हो तो भी फ़्लेवर चाय तो चाय का ही है, न आइस मिल्क टी का.
अब तो मुझे जानकारी नहीं है कि यह चाय वाला फ़्लेवर जापान के अलावा दूसरे देशों में भी मिलता (मिलेगा) या नहीं...
फिर चाय बोले तो...याद आता है वह चायख़ाना....
अहमदाबाद, शहर के पुराने इलाक़े मिर्ज़ापुर में तीनदरवाज़े के आसपास, "लकी टी स्टॉल".
जब अहमदाबाद में था, होटल के सामने ही वह दुकान खड़ी हुई थी, जहाँ हर सुबह नाश्ता करने और हर रात खाने के बाद चाय की चुसकी लेने जाता था. वहाँ की चाय उनमें से नंबर वन ही मनता हूँ जो चाय मैंने अभी तक पी लीं हैं.
और जब भी ख़ाली हो या बहुत बिज़ी, ओडर से थोड़ी ही देर में तेज़ चाय आती है. मगर हमेशा स्वाद बिल्कुल सही होता है. मतलब, अगर दूसरी दुकान में बिज़ी हो तो ज़्यादा जल्द ही जल्द बनाने से कच्ची बेकार चाय आ सकती है, और ख़ाली हो तो लंबी देर तक बना रखी खड़वी चाय मिल सकती है. ऐसा कभी नहीं हुआ उस दुकान में.
फिर भी वह तो गरम गरम तो नहीं....ठंडी ठंडी चाय ही....

.....यानी चाय फ़्लेवर आइस्क्रीम..... (120ml/250¥)
गत माह से टी.वी. पर विज्ञापन लगाया गया है, बार बार जो देखके मुझे अजीब सा लगा. सितार व तबला बजते हैं, न जाने क्यों साड़ी पहने हुई गोरी महिला पद्मासन में बैठी है, उसकी आँखें बंद हुई हैं और फिर हाथ में चाय आइसक्रीम लिए आराम करती है.
मशहूर आइस्क्रीम कंपनी "Häagen-Dazs" का ब्रांड यहाँ ऐसा माना जाता है कि दाम महँगा तो पड़ता है लेकिन वही मज़ा किसी दूसरों में कहीं नहीं मिलता. सोचा था कि यह वाला फ़्लेवर भी शायद अच्छा तो होगा मगर....कैसा...!?
आज ख़रीद लेके एक चम्मच चख लिया तो... वाह, ज़बान पर इलायची और दारचीनी की ख़ुशबू हलकी हलकी आती है. ठीक ठाक तो होगा, ठंडी हो तो भी फ़्लेवर चाय तो चाय का ही है, न आइस मिल्क टी का.
अब तो मुझे जानकारी नहीं है कि यह चाय वाला फ़्लेवर जापान के अलावा दूसरे देशों में भी मिलता (मिलेगा) या नहीं...
फिर चाय बोले तो...याद आता है वह चायख़ाना....
अहमदाबाद, शहर के पुराने इलाक़े मिर्ज़ापुर में तीनदरवाज़े के आसपास, "लकी टी स्टॉल".
जब अहमदाबाद में था, होटल के सामने ही वह दुकान खड़ी हुई थी, जहाँ हर सुबह नाश्ता करने और हर रात खाने के बाद चाय की चुसकी लेने जाता था. वहाँ की चाय उनमें से नंबर वन ही मनता हूँ जो चाय मैंने अभी तक पी लीं हैं.
और जब भी ख़ाली हो या बहुत बिज़ी, ओडर से थोड़ी ही देर में तेज़ चाय आती है. मगर हमेशा स्वाद बिल्कुल सही होता है. मतलब, अगर दूसरी दुकान में बिज़ी हो तो ज़्यादा जल्द ही जल्द बनाने से कच्ची बेकार चाय आ सकती है, और ख़ाली हो तो लंबी देर तक बना रखी खड़वी चाय मिल सकती है. ऐसा कभी नहीं हुआ उस दुकान में.
फ़रवरी 17, 2005
जापानी अक्षरमाला
[*22 Jan. 2012 - कुछ कुछ अंगों पर शब्दों-वाक्यों का संशोधन]
इस बार ज़रा दिखाता हूँ कैसे होते हैं वे पूर्वी एशियाई अक्षर, जो विशेष कर जापानी भाषा में प्रयोग किए जाते हैं. मेरी ख़्याल में जापानी भाषा उतनी मुश्किल नहीं है बोलचाल में, मगर सही ढंग से लिखना-पढ़ना बड़ा थकाऊ काम होगा, चुंकि कई विषयों में इसके अक्षरों में जटिलताएँ होती हैं.
एक वजह यह है कि आम तौर पर 3 तरह की अक्षर-लिपिओं से लिखी जाती है जापानी भाषा.
1. हीरा-गाना लिपि
2. काता-काना लिपि
3. कांजी लिपि
कांजी लिपि मूलतः चीनी भाषा(ओं) से ली गई हैं, जिनके रूप किसी हद तक समान होते हैं जहाँ भी हो, ताइवान, होंगकोंग और मेनलैंड चीन (मगर कम्युनिस्ट सरकार द्वारा साक्षरता के सुधार के मद्दे नज़र अक्षर-सरलीकरण नीति लाई गई जिससे कई अक्षरों के रूपों में कुछ अंतर हुआ है). पहले कोरिया और वियतनाम में भी प्रयोग की गई थी. ऐसे चीनी अक्षरों की एक विशेषता चित्रलिपि (ideogram) होने में है, यानी हर एक अक्षर शाब्दिक अल्पतम इकाई होता है, जिसका अर्थ स्वयं ही किसी न किसी तरह बन सकता है, किसी भी भाषा-बोली में कैसी तरह भी वह चीनी अक्षर उच्चारण किया जाता है तो भी. हम जापानी भाषी लोग भी रोज़ अपने तरीक़े से वे अक्षर लिखते पढ़ते हैं, सो जब चीनी भाषा के शब्द/वाक्य भी देखें तो किसी न किसी हद तक उसके अर्थ का अंदाज़ा लगा सकते हैं, चाहे वह भाषा सुनने से तो बिलकुल न समझ में आए तो भी.
जापानी भाषा भी पहले केवल चीनी अक्षरों से ही लिखी जाती थी. फिर उन अक्षरों से 2 क़िस्मों के लिपि, हीरा-गाना और काता-काना बनाकर मिश्रित ढंग से आजकल एकसाथ इस्तेमाल करते हैं. ये दोनों लिपि ध्वनिप्रधान (phonetic) हैं, जैसे नीचे वाली सूची में देखा जाता है. इस लिए सिद्धांत रूप में यदि कोइ चाहे तो पूरा वाक्या उन दोनों में से एक लिपि ही में लिखा जा सकता है. लेकिन नियमोनुसार ऐसा तो नहीं होता है. अगर कभी हो तो भी अजीब सा लगेगा, मानो बच्चों के लिए लिखा गया हो (मसलन पहेली कक्षा की स्कूल पाठ्य पुस्तकें). और एक समस्य है कि जापानी भाषा में बहुत से समध्वनीय भिन्नार्थक शब्द (homonyms) होते हैं (स्वदेशी मूल तथा चीनी भाषा मूल दोनों), जिसकी वजह से लिखित जापानी भाषा में चीनी अक्षरों का भी प्रयोग कर लिखना ज़रूरी है, ताकि बिना ग़लतफ़हमी ऐसे समध्वनीय भिन्नार्थक शब्दों के सही मतलब पहचान सकें.
आम तौर पर जापानी लोगों और जगहों के नाम कांजी-लिपि में रखे जाते हैं. फिर भी कुछ परिस्थितियों में, ख़ासकर लड़कियों के नाम, हीरा-गाना लिपि में भी बहुधा रखे जाते हैं, क्योंकि हीरा-गाना के रूप हलकी टेढ़ी लक़ीरों से बनते हैं, तो देखने में नरम, प्यारा और मधुर जैसा महसास होता है. और जापानी भाषा में ऐसे प्रतिरूप की जगह पर इस्तेमाल होता है, मसलन "-करता", "-एँगे", "है", "पर", "में", "-के लिए", "-से", "यह", "वहाँ", "कैसा" आदि.
काता-काना लिपि का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में होता है, जैसाकि अनुकरणवाचक (onomatopoeic) शब्दों के लिए, और इससे भी अधिकतर विदेश मूल के शब्दों और विदेशी लोगों-जगहों के नामों के लए.
अब व्याख्या ज़्यादा हो गई, तो आगे वाली सूची देखें....
* नीचे सूची के जापानी स्वरों के लिए "आ" की जगह "अ", "ई" की जगह "इ", और "ऊ" की जगह "उ" का प्रयोग किया. यकीनन आप जब जापानी भाषा का बोलचाल सीखें तो ऐसा पाएँगे कि इन स्वरों का वास्तविक उच्चारण मामूली तौर पर बिलकुल उलटा ही होता है और अधिकाँश तौर पर "आ", "ई", "ऊ" के स्वरों में ही बोलना बहेतर होगा. मैं सहज रूप में हिंदी भाषी नहीं हूँ, इस लिए पता लगाना, अगर नामुमुकिन नहीं तो भी, कुछ कठिन होता है कि किन -किन स्वरों में जापानी शब्द का उच्चारण वर्णन किया जाना चाहिए. लेकिन यहाँ मेरा मकसद यह है कि जपानी भाषा के अंदर भी होने वाले छोटे-लंबे स्वर-अंतर के वर्णन पर ध्यान देते हुए, कम से कम तत्कालीन तौर पर पारिभाषित तो किया जाए.
あ ア *1अ - い イ *1इ - う ウ *1 उ - え エ *1ए - お オ *1ओ
か カ *2क - き キ कि - く ク कु - け ケ के - こ コ को
さ サ स - し シ *3शि - す ス सु - せ セ से - そ ソ सो
た タ त - ち チ *4 चि - つ ツ *5त्सु - て テ ते - と ト तो
な ナ न - に ニ नि - ぬ ヌ नु - ね ネ ने - の ノ नो
は ハ ह - ひ ヒ हि - ふ フ *6 हु /फ़ु - へ ヘ हे - ほ ホ हो
ま マ म - み ミ मि - む ム मु - め メ मे - も モ मो
や ヤ य - ゆ ユ यु - よ ヨ यो
ら ラ *7र - り リ रि - る ル रु - れ レ रे - ろ ロ रो
わ ワ व - *8(ゐ ヰ वि ) - *8(ゑ ヱ वे ) - を ヲ *9ओ /वो
ん ン *10न्
इस सूची को कहते हैं "हीरा-गाना गो-जू ओन ज़ु" यानी पचासा ध्वनि सूची (लेकिन अब 50 तक नहीं), जिसमें सबसे ऊपर 5 स्वर (vowels) श्रेणी, उससे नीचे वयंजनों (consonants) की श्रेणियाँ क्रमशः व्यवस्थित की जाती हैं. पारंपरिक तरीक़े से जापानी भाषा का वाक्य ऊपर से नीचे की तरफ़ लिखा जाता है, तो इस लिए यह सूची मौलिक रूप में तो ऊपर को दाईं, नीचे को बाईं तरफ़ होनी है.
बुनियादी तौर पर हर अक्षर ([न्] और कई अन्य अपवाद छोड़के) व्यंजन+स्वर, हमेशा दोनों जुड़े बना अक्षर (a syllable) होता है. इस लिए जब जापानी भाषा में विदेश मूल शब्द अपनाया जाता है तब उसके स्वरहीन व्यंजन (न् छोड़के) को देशी लिपि में लिखित रूप गढ़ने के लिए साधन नहीं है, और इसके बदले में ऐसा स्वरहीन व्यंजन से स्वर जोड़ना ही होता है. इस परिवर्तन का नतीजा यह है कि ज़्यादातर विदेशी मूल के, ख़ासकर अंग्रेज़ी मूल के जापानी शब्द गैर-जापानी भाषियों को कभी थोड़ी-बहुत अजीब सुनाई देते हैं, या बिलकुल समझ में नहीं आते है, क्योंकि बीच में मूलतः अनहोनी स्वर भी जोड़के बोले जाते हैं. स्वरहीन व्यंजनों को बोलने या लिखने के लिए आम तौर पर नीचे की तरह तबदीली होती है.
1.[क्/ग्/स्/त्स्/ज़्/प्/ब्/*र्/श्/ह्] = + [उ]
[ex;ストレス (stress, मानसिक दबाव) : सु-तो-रे-सु (←स्-त्-रे-स्)]
2.[त्/द्] = + (छोटा) [ओ]
[ex;トランプ (trump, तुरुप) : तो-र-न्-पु (←त्-र-न्-प्)]
कई परिस्थितियों में शब्दों के अंत में डबल व्यंजनीकरण [-त्तो][-द्दो]
[ex;バグダッド (बग़दाद) : ब-गु-द-द्दो (←ब-ग्-द-द्)]
* ऐसे डबल व्यंजनों के लिए छोटे "त्सु" [-っ-/-ッ-, (+व्यंजन)] लिखते हैं.
[-क्क्-/-स्स्-/-त्त्-/-च्च्-/-प्प्-, (-ग्ग्-/-द्द्-/-ज्ज्-/-ब्ब्-/-र्र्-/-श्श्-; विदेशी मूल के शब्दों में) ]
3.[च्/ज्] = + [इ]
[ex;ビーチ (beach, बालू भरे समुद्रतट) :बी-चि (←बी-च्)]
* अँग्रेज़ी मूल के शब्द में शब्दांत पर आने वाले [र्] ब्रिटिश-अंग्रेज़ी बोली के उच्चारण की तरह मिट जाता है.
[-er: -आ (←-अर्/-आर्)]
फिर भी अपवाद; [ビール (beer, बियर्) : बी-रु]
जापानी में भी [अ-आ] जैसे छोटे-लंबे स्वरों के बीच फ़र्क़ होता है. लंबे स्वर लिखित रूप में एक छोटे स्वर वाले अक्षर के बाद,
1; उसी स्वर का स्वर-अक्षर दोहराकर
[ex; おばあさん (दादी-नानी, बूढ़ी महिला) :बोलने को ओ-बा-सन्, लिखने को ओ-बअ-सन् ]
2; एक सपाट रेखा [ー] जोड़कर
[ex; デリー (दिल्ली) : दे (छोटा-ए) -री ]
फिर भी स्वर-लंबाई हिंदी की तुलने में अलग-थलग सी सुनाई देती होगी तो कुछ मुश्किल भी होता है. ख़ुसूसन किसी व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ (proper nouns), लोगों-जगहों के नामों को एक दूसरी भाषा व लिपि में अंतरण करने के लिए.
जा→हिं अंतरण में स्वर-संतुलन की आवश्यकता है. हिंदी (तथा शायद कुछ अन्य उत्तर भारतिय भाषाओं) में स्वर [ए] और [ओ] आम तौर लंबे ही होते हैं. देवनागरी लिपि में व्यंजन-अक्षर [क/ग/ख...] का छोटा स्वर "अ" शब्द के कहीं बीच और अंत में मिट जाता है, और अरबी-फ़ारसी लिपि में तीन छोटे स्वर "अ/इ/उ" ज़ाहिर नहीं हैं, सो संतुलन करने को कभी कभी छोटे स्वर को लंबे स्वर से लिखना [अ→आ/इ→ई/उ→ऊ] ज़रूरी है.
वैसे मिसाल के लिए ऊपर लिखा शब्द
"हीरा-गाना" तक़रीबन असली ध्वनिओं से देखें तो [ह्-इ र्-अ ग्-अ न्-अ] है, फिर इसको हिरगन ही लिखे तो [हि र् ग न्] पढ़ेंगे.
लेकिन स्वरों की लंबाई में संतुलन लाने के लिए कुछ हद तक स्वच्छंद प्रयोग की स्वतंत्रता अभी भी बची हुई है. अगर आगे सालों में जापानी शब्द बहुत हिंदी में आ जाएँ तो, निश्चित रूप में शब्द अंतरण का नियम बन जाएगा, शायद.
*1जापानी में ये बुनियादी पंचस्वर मूलतः सब छोटे स्वर होते हैं. छोटा [ए], जैसे 'पहला' के "-ह-" वाला स्वर होता है, और छोटा [ओ], जैसे 'बहुत' के "-हु-" वाला स्वर होता है.
*2जापानी भाषा में [क-ख] जैसे अल्पप्राण-महाप्राण (unaspirated/aspirated) व्यंजनों का अंतर पहचाना नहीं जाता, मगर कभी कभी अनजाने में ही महाप्राण से बोला भी जाते हैं कुछ शब्द, ख़ासकर वाक्य का पहला व्यंजन जिसके उच्चारण के लिए अधिकाँश तौर पर कहीं ज़ोर दिया जाता है.
*3[सि] (या [सी]) के उच्चारण के बजाय [शि] (या [शी]) ही होता था. आज तो युवा पीढ़ियाँ सुन-बोलकर पहचान सकती हैं. फिर भी आम तौर पर अख़बार जैसे लिखित भाषा में "शि" का ही प्रयोग उचित माना जाता है. सुना है, कोरिया भाषा में भी ऐसा होता है.
[ex; シーディー (CD, CompactDisc) : शी-दी (←सी-दी) ]
*4[ति] (या [ती]) के उच्चारण के बजाय, [चि] (या [ची]), ही होता था. मगर यह अंतर आजकल ज़्यादा लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; チーム (team, दल) : ची-मु (←ती-मु)]
*5[तु] (या [तू]) के उच्चारण के बजाय, [त्सु] (या [त्सू]) ही होता था. यह अंतर भी आजकल ज़्यादा लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ツール (tool, औज़ार) : त्सू-रु (←तू-रु) ]
*6रोमन-लिपि में [hu] नहीं बल्कि [fu] लिखते हैं, शायद ताकि अंग्रेज़ी भाषा के तरीके से, यानी "huge" या "human" वाले ह्यू की तरह, न पढ़ा जाए. फिर भी जापानी भाषा के [ふ] [フ] का उच्चारण अंग्रेज़ी भाषा के [fu] की तरह दांत से नीचे होंठ थोड़ा लगाकर तो नहीं किया जाता है.
*7जापानी भाषा में व्यंजन [र्-] और [ल्-] के बेच अंतर नहीं पहचाना जाता है. मामूली तौर पर रोमन-लिपि में [r] से वर्णन किया जाता है, इस लिए सहज जापानी भाषियों के कानों में विदेशी मूल शब्दों के [ल्-] (और हिंदी के [ड़्-] [ढ़्-] भी) सुनकर अधिकाँश तौर पर [र्-] के रूप में समझा जाता हैं, तो ऐसे ही बोला-लिखा जाता भी हैं. मगर दूसरी तरफ़, यानी जापानी भाषा के [ら][り][る][れ][ろ] में व्यंजन का उच्चारण पर देखा जाए तो मूलतः न तो [र्-] होता है न [ल्-], बल्कि दोनों के कहीं बीच में आ सकता है. लेकिन आप के लिए बोलना कोइ मुश्किल काम नहीं, आप [र्-] का व्यंजन में बोले तो काफ़ी है.
*8[ゐ] [ヰ], [ゑ] [ヱ] इन अक्षरों को आधुनिक प्रयोग में [い][イ], [え][エ] से विनिमय किया गया है. इस लिए इन अक्षरों का आधिकारिक प्रयोग बहुत कम ही होता गया है. अब ये अक्षर बूढ़ी महिलाओं के नामों आदि में ही देखने को मिल सकते हैं.
*9पहले इस अक्षर का उच्चारण "वो" की तरह किया जाता था. मगर आधुनिक जापानी भाषा में पंचस्वर के [お][オ] से सामान उच्चारण किया जाता है. व्याकरण की दृष्टि से यह अक्षर कर्म (an object) के शब्द को सूचित करता है इस लिए आम तौर पर अखबार आदि लिखित सामग्री पर बहुत प्रयोग होता है.
*10यह अक्षर का उच्चारण पीछे व्यंजन से बदलता है.
[ङ्-;-क्/-ग्, ञ्-;-च्/-ज्, म्-;-प्/-ब्]
ख़ासकर पीछे पर स्वर आता है तो [न्] के बाद क्षण भर वक्फ़ा रखकर स्वर का उच्चारण करना चाहिए.
[न् + अ/इ/उ/ए/ओ = न्'- vowel]
मसलन,
"Junichiro" Koizumi, जापान के पूर्व-प्रधानमंत्री का नाम भी "जुन्'इचिरो" की तरह बोलना चाहिए, न जुनिचिरो.
बाक़ी व्यंजनों वाले अक्षर लिखने के लिए ऊपर की पचासा ध्वनि सूची अक्षरों के दाएँ-ऊपर अंग पर छोटे दो नुक़्ते [゛] या छोटा चक्र [゜] लगाते हैं, या छोटे स्वर [अ/इ/ए/ओ] - अधस्वर [य/यु/यो] अक्षर पीछे पर रखते हैं.
が ガ ग - ぎ ギ गि - ぐ グ गु - げ ゲ गे - ご ゴ गो
ざ ザ ज़ - じ ジ *11जि - ず ズ ज़ु - ぜ ゼ ज़े - ぞ ゾ ज़ो
だ ダ द - ぢ ヂ *12जि - づ ヅ *13ज़ु - で デ दे - ど ド दो
ぱ パ प - ぴ ピ पि - ぷ プ पु - ぺ ペ पे - ぽ ポ पो
ば バ ब - び ビ बि - ぶ ブ बु - べ ベ बे - ぼ ボ बो
*11[ज़ि] (या [ज़ी]) के उच्चारण के बजाय [जि] (या [जी]) का ही होता था. मगर आजकल युवा पीढ़ियाँ सुन-बोलकर पहचान सकती हैं. फिर भी अख़बार जैसे लिखित भाषा में आम तौर पर "जि" का ही प्रयोग होता है.
[ex; イージー (easy, आसान) : ई-जी (←ई-ज़ी) ]
*12[दि] (या [दी]) के उच्चारण के बजाय, [जि] (या [जी]) का ही होता था. मगर आजकल ज़्यादातार लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ガンジー (गांधी) : ग-न्-जी (←ग-न्-दी)]
*13[दु] (या [दू]) के उच्चारण के बजाय, [ज़ु] (या [ज़ू]) का ही होता था. मगर आजकल ज़्यादातार लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ヒンズー (हिंदू) : हि-न्-ज़ू (←हि-न्-दू) ]
ये ध्वनि व अक्षर मूलतः चीनी भाषा मूल के शब्दों के लिए जापानी भाषा में अपनाए गए हैं. इस लिए कांजी में लिखे जाने वाले शब्दों के उच्चारण के लिए सुनने को मिलेगा, पर इससे सीमित नहीं है और अन्य बहुत विदेशी मूल के शब्दों के लिए भी प्रयोग हो सकता है.
きゃ キャ क्य - きゅ キュ क्यु - きょ キョ क्यो
ぎゃ ギャ ग्य - ぎゅ ギュ ग्यु - ぎょ ギョ ग्यो
しゃ シャ श - しゅ シュ शु - しょ ショ शो
じゃ ジャ ज - じゅ ジュ जु - じょ ジョ जो
ちゃ チャ च - ちゅ チュ चु - ちょ チョ चो
にゃ ニャ न्य - にゅ ニュ न्यु - にょ ニョ न्यो
ひゃ ヒャ ह्य - ひゅ ヒュ ह्यु - ひょ ヒョ ह्यो
ぴゃ ピャ प्य - ぴゅ ピュ प्यु - ぴょ ピョ प्यो
びゃ ビャ ब्य - びゅ ビュ ब्यु - びょ ビョ ब्यो
みゃ ミャ म्य - みゅ ミュ म्यु - みょ ミョ म्यो
りゃ リャ र्+य - りゅ リュ र्+यु - りょ リョ र्+यो
ये ध्वनि व अक्षर मूलतः विदेशी भाषा मूल के शब्दों के उच्चारण को वर्णन करने के लिए ही अपनाए गए हैं. इस लिए आम तौर पर काता-काना लिपि में ही लिखे जाते हैं.
ふぁ ファ फ़ - ふぃ フィ फ़ि - *14○◇△ - ふぇ フェ फ़े - ふぉ フォ फ़ो
*15○◇△ - うぃ ウィ *16वि - *17○◇△ - うぇ ウェ वे - うぉ ウォ वो
*18○ ヴァ *19व - ○ ヴィ वी - ○ ヴ वु - ○ ヴェ वे - ○ ヴォ वो
しぇ シェ शे
じぇ ジェ जे
ちぇ チェ चे
すぃ スィ सि
ずぃ ズィ ज़ि
てぃ ティ ति
でぃ ディ दि
とぅ トゥ तु
どぅ ドゥ दु
*14 = *6"फ़ु"
*15 = पच्चासा ध्वनि का "व"
*16अँग्रेज़ी के व्यंजन [w] वाला "व", न [v].
*17 = स्वर "उ"
*18हीरा-गाना लिपि में फ़ोंट नहीं है, शायद इसलिए कि आम तौर पर ये काता-काना लिपि से ही लिखे जाते हैं.
*19अँग्रेज़ी के व्यंजन [v] वाला "व"
मेरी इतनी भाषावैज्ञानिक जानकारी नहीं है, इस लिए मेरी ऊपर लिखी बातों में कहीं कुछ ग़लती निकली तो बता दीजिएगा.
लेकिन मेरा मकसद आपको यह समझाना था कि मैं अक्सर कैसी तरह जापानी-हिंदी के शब्दों को एक दूसरी लिपि में वर्णन करता हूँ. जापानी-हिंदी के बीच या दूसरी भाषा होकर बहुत शब्द आते-जाते हैं, जिनमें से ज़्यादातर शब्द किसी न किसी वजह से ग़लत रूप में वर्णन किए हुए फ़ेलाए जाते हैं. ऐसी ग़लतियाँ आपस में पैदा हो जाती हैं जब दोनों भाषाओं की ध्वनि-संरचनाओं और इनकी विशेषताओं से अनजानी होते हैं. यह रहा मेरा इरादा, यानी, ऐसी ग़लतियाँ रोकने की छोटी सी कोशिश.
इस बार ज़रा दिखाता हूँ कैसे होते हैं वे पूर्वी एशियाई अक्षर, जो विशेष कर जापानी भाषा में प्रयोग किए जाते हैं. मेरी ख़्याल में जापानी भाषा उतनी मुश्किल नहीं है बोलचाल में, मगर सही ढंग से लिखना-पढ़ना बड़ा थकाऊ काम होगा, चुंकि कई विषयों में इसके अक्षरों में जटिलताएँ होती हैं.
एक वजह यह है कि आम तौर पर 3 तरह की अक्षर-लिपिओं से लिखी जाती है जापानी भाषा.
1. हीरा-गाना लिपि
2. काता-काना लिपि
3. कांजी लिपि
कांजी लिपि मूलतः चीनी भाषा(ओं) से ली गई हैं, जिनके रूप किसी हद तक समान होते हैं जहाँ भी हो, ताइवान, होंगकोंग और मेनलैंड चीन (मगर कम्युनिस्ट सरकार द्वारा साक्षरता के सुधार के मद्दे नज़र अक्षर-सरलीकरण नीति लाई गई जिससे कई अक्षरों के रूपों में कुछ अंतर हुआ है). पहले कोरिया और वियतनाम में भी प्रयोग की गई थी. ऐसे चीनी अक्षरों की एक विशेषता चित्रलिपि (ideogram) होने में है, यानी हर एक अक्षर शाब्दिक अल्पतम इकाई होता है, जिसका अर्थ स्वयं ही किसी न किसी तरह बन सकता है, किसी भी भाषा-बोली में कैसी तरह भी वह चीनी अक्षर उच्चारण किया जाता है तो भी. हम जापानी भाषी लोग भी रोज़ अपने तरीक़े से वे अक्षर लिखते पढ़ते हैं, सो जब चीनी भाषा के शब्द/वाक्य भी देखें तो किसी न किसी हद तक उसके अर्थ का अंदाज़ा लगा सकते हैं, चाहे वह भाषा सुनने से तो बिलकुल न समझ में आए तो भी.
जापानी भाषा भी पहले केवल चीनी अक्षरों से ही लिखी जाती थी. फिर उन अक्षरों से 2 क़िस्मों के लिपि, हीरा-गाना और काता-काना बनाकर मिश्रित ढंग से आजकल एकसाथ इस्तेमाल करते हैं. ये दोनों लिपि ध्वनिप्रधान (phonetic) हैं, जैसे नीचे वाली सूची में देखा जाता है. इस लिए सिद्धांत रूप में यदि कोइ चाहे तो पूरा वाक्या उन दोनों में से एक लिपि ही में लिखा जा सकता है. लेकिन नियमोनुसार ऐसा तो नहीं होता है. अगर कभी हो तो भी अजीब सा लगेगा, मानो बच्चों के लिए लिखा गया हो (मसलन पहेली कक्षा की स्कूल पाठ्य पुस्तकें). और एक समस्य है कि जापानी भाषा में बहुत से समध्वनीय भिन्नार्थक शब्द (homonyms) होते हैं (स्वदेशी मूल तथा चीनी भाषा मूल दोनों), जिसकी वजह से लिखित जापानी भाषा में चीनी अक्षरों का भी प्रयोग कर लिखना ज़रूरी है, ताकि बिना ग़लतफ़हमी ऐसे समध्वनीय भिन्नार्थक शब्दों के सही मतलब पहचान सकें.
आम तौर पर जापानी लोगों और जगहों के नाम कांजी-लिपि में रखे जाते हैं. फिर भी कुछ परिस्थितियों में, ख़ासकर लड़कियों के नाम, हीरा-गाना लिपि में भी बहुधा रखे जाते हैं, क्योंकि हीरा-गाना के रूप हलकी टेढ़ी लक़ीरों से बनते हैं, तो देखने में नरम, प्यारा और मधुर जैसा महसास होता है. और जापानी भाषा में ऐसे प्रतिरूप की जगह पर इस्तेमाल होता है, मसलन "-करता", "-एँगे", "है", "पर", "में", "-के लिए", "-से", "यह", "वहाँ", "कैसा" आदि.
काता-काना लिपि का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में होता है, जैसाकि अनुकरणवाचक (onomatopoeic) शब्दों के लिए, और इससे भी अधिकतर विदेश मूल के शब्दों और विदेशी लोगों-जगहों के नामों के लए.
अब व्याख्या ज़्यादा हो गई, तो आगे वाली सूची देखें....
* नीचे सूची के जापानी स्वरों के लिए "आ" की जगह "अ", "ई" की जगह "इ", और "ऊ" की जगह "उ" का प्रयोग किया. यकीनन आप जब जापानी भाषा का बोलचाल सीखें तो ऐसा पाएँगे कि इन स्वरों का वास्तविक उच्चारण मामूली तौर पर बिलकुल उलटा ही होता है और अधिकाँश तौर पर "आ", "ई", "ऊ" के स्वरों में ही बोलना बहेतर होगा. मैं सहज रूप में हिंदी भाषी नहीं हूँ, इस लिए पता लगाना, अगर नामुमुकिन नहीं तो भी, कुछ कठिन होता है कि किन -किन स्वरों में जापानी शब्द का उच्चारण वर्णन किया जाना चाहिए. लेकिन यहाँ मेरा मकसद यह है कि जपानी भाषा के अंदर भी होने वाले छोटे-लंबे स्वर-अंतर के वर्णन पर ध्यान देते हुए, कम से कम तत्कालीन तौर पर पारिभाषित तो किया जाए.
あ ア *1अ - い イ *1इ - う ウ *1 उ - え エ *1ए - お オ *1ओ
か カ *2क - き キ कि - く ク कु - け ケ के - こ コ को
さ サ स - し シ *3शि - す ス सु - せ セ से - そ ソ सो
た タ त - ち チ *4 चि - つ ツ *5त्सु - て テ ते - と ト तो
な ナ न - に ニ नि - ぬ ヌ नु - ね ネ ने - の ノ नो
は ハ ह - ひ ヒ हि - ふ フ *6 हु /फ़ु - へ ヘ हे - ほ ホ हो
ま マ म - み ミ मि - む ム मु - め メ मे - も モ मो
や ヤ य - ゆ ユ यु - よ ヨ यो
ら ラ *7र - り リ रि - る ル रु - れ レ रे - ろ ロ रो
わ ワ व - *8(ゐ ヰ वि ) - *8(ゑ ヱ वे ) - を ヲ *9ओ /वो
ん ン *10न्
इस सूची को कहते हैं "हीरा-गाना गो-जू ओन ज़ु" यानी पचासा ध्वनि सूची (लेकिन अब 50 तक नहीं), जिसमें सबसे ऊपर 5 स्वर (vowels) श्रेणी, उससे नीचे वयंजनों (consonants) की श्रेणियाँ क्रमशः व्यवस्थित की जाती हैं. पारंपरिक तरीक़े से जापानी भाषा का वाक्य ऊपर से नीचे की तरफ़ लिखा जाता है, तो इस लिए यह सूची मौलिक रूप में तो ऊपर को दाईं, नीचे को बाईं तरफ़ होनी है.
बुनियादी तौर पर हर अक्षर ([न्] और कई अन्य अपवाद छोड़के) व्यंजन+स्वर, हमेशा दोनों जुड़े बना अक्षर (a syllable) होता है. इस लिए जब जापानी भाषा में विदेश मूल शब्द अपनाया जाता है तब उसके स्वरहीन व्यंजन (न् छोड़के) को देशी लिपि में लिखित रूप गढ़ने के लिए साधन नहीं है, और इसके बदले में ऐसा स्वरहीन व्यंजन से स्वर जोड़ना ही होता है. इस परिवर्तन का नतीजा यह है कि ज़्यादातर विदेशी मूल के, ख़ासकर अंग्रेज़ी मूल के जापानी शब्द गैर-जापानी भाषियों को कभी थोड़ी-बहुत अजीब सुनाई देते हैं, या बिलकुल समझ में नहीं आते है, क्योंकि बीच में मूलतः अनहोनी स्वर भी जोड़के बोले जाते हैं. स्वरहीन व्यंजनों को बोलने या लिखने के लिए आम तौर पर नीचे की तरह तबदीली होती है.
1.[क्/ग्/स्/त्स्/ज़्/प्/ब्/*र्/श्/ह्] = + [उ]
[ex;ストレス (stress, मानसिक दबाव) : सु-तो-रे-सु (←स्-त्-रे-स्)]
2.[त्/द्] = + (छोटा) [ओ]
[ex;トランプ (trump, तुरुप) : तो-र-न्-पु (←त्-र-न्-प्)]
कई परिस्थितियों में शब्दों के अंत में डबल व्यंजनीकरण [-त्तो][-द्दो]
[ex;バグダッド (बग़दाद) : ब-गु-द-द्दो (←ब-ग्-द-द्)]
* ऐसे डबल व्यंजनों के लिए छोटे "त्सु" [-っ-/-ッ-, (+व्यंजन)] लिखते हैं.
[-क्क्-/-स्स्-/-त्त्-/-च्च्-/-प्प्-, (-ग्ग्-/-द्द्-/-ज्ज्-/-ब्ब्-/-र्र्-/-श्श्-; विदेशी मूल के शब्दों में) ]
3.[च्/ज्] = + [इ]
[ex;ビーチ (beach, बालू भरे समुद्रतट) :बी-चि (←बी-च्)]
* अँग्रेज़ी मूल के शब्द में शब्दांत पर आने वाले [र्] ब्रिटिश-अंग्रेज़ी बोली के उच्चारण की तरह मिट जाता है.
[-er: -आ (←-अर्/-आर्)]
फिर भी अपवाद; [ビール (beer, बियर्) : बी-रु]
जापानी में भी [अ-आ] जैसे छोटे-लंबे स्वरों के बीच फ़र्क़ होता है. लंबे स्वर लिखित रूप में एक छोटे स्वर वाले अक्षर के बाद,
1; उसी स्वर का स्वर-अक्षर दोहराकर
[ex; おばあさん (दादी-नानी, बूढ़ी महिला) :बोलने को ओ-बा-सन्, लिखने को ओ-बअ-सन् ]
2; एक सपाट रेखा [ー] जोड़कर
[ex; デリー (दिल्ली) : दे (छोटा-ए) -री ]
फिर भी स्वर-लंबाई हिंदी की तुलने में अलग-थलग सी सुनाई देती होगी तो कुछ मुश्किल भी होता है. ख़ुसूसन किसी व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ (proper nouns), लोगों-जगहों के नामों को एक दूसरी भाषा व लिपि में अंतरण करने के लिए.
जा→हिं अंतरण में स्वर-संतुलन की आवश्यकता है. हिंदी (तथा शायद कुछ अन्य उत्तर भारतिय भाषाओं) में स्वर [ए] और [ओ] आम तौर लंबे ही होते हैं. देवनागरी लिपि में व्यंजन-अक्षर [क/ग/ख...] का छोटा स्वर "अ" शब्द के कहीं बीच और अंत में मिट जाता है, और अरबी-फ़ारसी लिपि में तीन छोटे स्वर "अ/इ/उ" ज़ाहिर नहीं हैं, सो संतुलन करने को कभी कभी छोटे स्वर को लंबे स्वर से लिखना [अ→आ/इ→ई/उ→ऊ] ज़रूरी है.
वैसे मिसाल के लिए ऊपर लिखा शब्द
"हीरा-गाना" तक़रीबन असली ध्वनिओं से देखें तो [ह्-इ र्-अ ग्-अ न्-अ] है, फिर इसको हिरगन ही लिखे तो [हि र् ग न्] पढ़ेंगे.
लेकिन स्वरों की लंबाई में संतुलन लाने के लिए कुछ हद तक स्वच्छंद प्रयोग की स्वतंत्रता अभी भी बची हुई है. अगर आगे सालों में जापानी शब्द बहुत हिंदी में आ जाएँ तो, निश्चित रूप में शब्द अंतरण का नियम बन जाएगा, शायद.
*1जापानी में ये बुनियादी पंचस्वर मूलतः सब छोटे स्वर होते हैं. छोटा [ए], जैसे 'पहला' के "-ह-" वाला स्वर होता है, और छोटा [ओ], जैसे 'बहुत' के "-हु-" वाला स्वर होता है.
*2जापानी भाषा में [क-ख] जैसे अल्पप्राण-महाप्राण (unaspirated/aspirated) व्यंजनों का अंतर पहचाना नहीं जाता, मगर कभी कभी अनजाने में ही महाप्राण से बोला भी जाते हैं कुछ शब्द, ख़ासकर वाक्य का पहला व्यंजन जिसके उच्चारण के लिए अधिकाँश तौर पर कहीं ज़ोर दिया जाता है.
*3[सि] (या [सी]) के उच्चारण के बजाय [शि] (या [शी]) ही होता था. आज तो युवा पीढ़ियाँ सुन-बोलकर पहचान सकती हैं. फिर भी आम तौर पर अख़बार जैसे लिखित भाषा में "शि" का ही प्रयोग उचित माना जाता है. सुना है, कोरिया भाषा में भी ऐसा होता है.
[ex; シーディー (CD, CompactDisc) : शी-दी (←सी-दी) ]
*4[ति] (या [ती]) के उच्चारण के बजाय, [चि] (या [ची]), ही होता था. मगर यह अंतर आजकल ज़्यादा लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; チーム (team, दल) : ची-मु (←ती-मु)]
*5[तु] (या [तू]) के उच्चारण के बजाय, [त्सु] (या [त्सू]) ही होता था. यह अंतर भी आजकल ज़्यादा लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ツール (tool, औज़ार) : त्सू-रु (←तू-रु) ]
*6रोमन-लिपि में [hu] नहीं बल्कि [fu] लिखते हैं, शायद ताकि अंग्रेज़ी भाषा के तरीके से, यानी "huge" या "human" वाले ह्यू की तरह, न पढ़ा जाए. फिर भी जापानी भाषा के [ふ] [フ] का उच्चारण अंग्रेज़ी भाषा के [fu] की तरह दांत से नीचे होंठ थोड़ा लगाकर तो नहीं किया जाता है.
*7जापानी भाषा में व्यंजन [र्-] और [ल्-] के बेच अंतर नहीं पहचाना जाता है. मामूली तौर पर रोमन-लिपि में [r] से वर्णन किया जाता है, इस लिए सहज जापानी भाषियों के कानों में विदेशी मूल शब्दों के [ल्-] (और हिंदी के [ड़्-] [ढ़्-] भी) सुनकर अधिकाँश तौर पर [र्-] के रूप में समझा जाता हैं, तो ऐसे ही बोला-लिखा जाता भी हैं. मगर दूसरी तरफ़, यानी जापानी भाषा के [ら][り][る][れ][ろ] में व्यंजन का उच्चारण पर देखा जाए तो मूलतः न तो [र्-] होता है न [ल्-], बल्कि दोनों के कहीं बीच में आ सकता है. लेकिन आप के लिए बोलना कोइ मुश्किल काम नहीं, आप [र्-] का व्यंजन में बोले तो काफ़ी है.
*8[ゐ] [ヰ], [ゑ] [ヱ] इन अक्षरों को आधुनिक प्रयोग में [い][イ], [え][エ] से विनिमय किया गया है. इस लिए इन अक्षरों का आधिकारिक प्रयोग बहुत कम ही होता गया है. अब ये अक्षर बूढ़ी महिलाओं के नामों आदि में ही देखने को मिल सकते हैं.
*9पहले इस अक्षर का उच्चारण "वो" की तरह किया जाता था. मगर आधुनिक जापानी भाषा में पंचस्वर के [お][オ] से सामान उच्चारण किया जाता है. व्याकरण की दृष्टि से यह अक्षर कर्म (an object) के शब्द को सूचित करता है इस लिए आम तौर पर अखबार आदि लिखित सामग्री पर बहुत प्रयोग होता है.
*10यह अक्षर का उच्चारण पीछे व्यंजन से बदलता है.
[ङ्-;-क्/-ग्, ञ्-;-च्/-ज्, म्-;-प्/-ब्]
ख़ासकर पीछे पर स्वर आता है तो [न्] के बाद क्षण भर वक्फ़ा रखकर स्वर का उच्चारण करना चाहिए.
[न् + अ/इ/उ/ए/ओ = न्'- vowel]
मसलन,
"Junichiro" Koizumi, जापान के पूर्व-प्रधानमंत्री का नाम भी "जुन्'इचिरो" की तरह बोलना चाहिए, न जुनिचिरो.
बाक़ी व्यंजनों वाले अक्षर लिखने के लिए ऊपर की पचासा ध्वनि सूची अक्षरों के दाएँ-ऊपर अंग पर छोटे दो नुक़्ते [゛] या छोटा चक्र [゜] लगाते हैं, या छोटे स्वर [अ/इ/ए/ओ] - अधस्वर [य/यु/यो] अक्षर पीछे पर रखते हैं.
が ガ ग - ぎ ギ गि - ぐ グ गु - げ ゲ गे - ご ゴ गो
ざ ザ ज़ - じ ジ *11जि - ず ズ ज़ु - ぜ ゼ ज़े - ぞ ゾ ज़ो
だ ダ द - ぢ ヂ *12जि - づ ヅ *13ज़ु - で デ दे - ど ド दो
ぱ パ प - ぴ ピ पि - ぷ プ पु - ぺ ペ पे - ぽ ポ पो
ば バ ब - び ビ बि - ぶ ブ बु - べ ベ बे - ぼ ボ बो
*11[ज़ि] (या [ज़ी]) के उच्चारण के बजाय [जि] (या [जी]) का ही होता था. मगर आजकल युवा पीढ़ियाँ सुन-बोलकर पहचान सकती हैं. फिर भी अख़बार जैसे लिखित भाषा में आम तौर पर "जि" का ही प्रयोग होता है.
[ex; イージー (easy, आसान) : ई-जी (←ई-ज़ी) ]
*12[दि] (या [दी]) के उच्चारण के बजाय, [जि] (या [जी]) का ही होता था. मगर आजकल ज़्यादातार लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ガンジー (गांधी) : ग-न्-जी (←ग-न्-दी)]
*13[दु] (या [दू]) के उच्चारण के बजाय, [ज़ु] (या [ज़ू]) का ही होता था. मगर आजकल ज़्यादातार लोग सुन-बोलकर पहचान सकते हैं.
[ex; ヒンズー (हिंदू) : हि-न्-ज़ू (←हि-न्-दू) ]
ये ध्वनि व अक्षर मूलतः चीनी भाषा मूल के शब्दों के लिए जापानी भाषा में अपनाए गए हैं. इस लिए कांजी में लिखे जाने वाले शब्दों के उच्चारण के लिए सुनने को मिलेगा, पर इससे सीमित नहीं है और अन्य बहुत विदेशी मूल के शब्दों के लिए भी प्रयोग हो सकता है.
きゃ キャ क्य - きゅ キュ क्यु - きょ キョ क्यो
ぎゃ ギャ ग्य - ぎゅ ギュ ग्यु - ぎょ ギョ ग्यो
しゃ シャ श - しゅ シュ शु - しょ ショ शो
じゃ ジャ ज - じゅ ジュ जु - じょ ジョ जो
ちゃ チャ च - ちゅ チュ चु - ちょ チョ चो
にゃ ニャ न्य - にゅ ニュ न्यु - にょ ニョ न्यो
ひゃ ヒャ ह्य - ひゅ ヒュ ह्यु - ひょ ヒョ ह्यो
ぴゃ ピャ प्य - ぴゅ ピュ प्यु - ぴょ ピョ प्यो
びゃ ビャ ब्य - びゅ ビュ ब्यु - びょ ビョ ब्यो
みゃ ミャ म्य - みゅ ミュ म्यु - みょ ミョ म्यो
りゃ リャ र्+य - りゅ リュ र्+यु - りょ リョ र्+यो
ये ध्वनि व अक्षर मूलतः विदेशी भाषा मूल के शब्दों के उच्चारण को वर्णन करने के लिए ही अपनाए गए हैं. इस लिए आम तौर पर काता-काना लिपि में ही लिखे जाते हैं.
ふぁ ファ फ़ - ふぃ フィ फ़ि - *14○◇△ - ふぇ フェ फ़े - ふぉ フォ फ़ो
*15○◇△ - うぃ ウィ *16वि - *17○◇△ - うぇ ウェ वे - うぉ ウォ वो
*18○ ヴァ *19व - ○ ヴィ वी - ○ ヴ वु - ○ ヴェ वे - ○ ヴォ वो
しぇ シェ शे
じぇ ジェ जे
ちぇ チェ चे
すぃ スィ सि
ずぃ ズィ ज़ि
てぃ ティ ति
でぃ ディ दि
とぅ トゥ तु
どぅ ドゥ दु
*14 = *6"फ़ु"
*15 = पच्चासा ध्वनि का "व"
*16अँग्रेज़ी के व्यंजन [w] वाला "व", न [v].
*17 = स्वर "उ"
*18हीरा-गाना लिपि में फ़ोंट नहीं है, शायद इसलिए कि आम तौर पर ये काता-काना लिपि से ही लिखे जाते हैं.
*19अँग्रेज़ी के व्यंजन [v] वाला "व"
मेरी इतनी भाषावैज्ञानिक जानकारी नहीं है, इस लिए मेरी ऊपर लिखी बातों में कहीं कुछ ग़लती निकली तो बता दीजिएगा.
लेकिन मेरा मकसद आपको यह समझाना था कि मैं अक्सर कैसी तरह जापानी-हिंदी के शब्दों को एक दूसरी लिपि में वर्णन करता हूँ. जापानी-हिंदी के बीच या दूसरी भाषा होकर बहुत शब्द आते-जाते हैं, जिनमें से ज़्यादातर शब्द किसी न किसी वजह से ग़लत रूप में वर्णन किए हुए फ़ेलाए जाते हैं. ऐसी ग़लतियाँ आपस में पैदा हो जाती हैं जब दोनों भाषाओं की ध्वनि-संरचनाओं और इनकी विशेषताओं से अनजानी होते हैं. यह रहा मेरा इरादा, यानी, ऐसी ग़लतियाँ रोकने की छोटी सी कोशिश.
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